भोपाल, 10 सितंबर।
मध्यप्रदेश में ग्राम पंचायतों की उदासीनता ग्रामीण विकास के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा बन गई है। प्रदेश की कुल 23 हजार 11 ग्राम पंचायतों में से 18 हजार 856 पंचायतों ने अब तक अपनी विकास कार्ययोजना ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पर अपलोड नहीं की है। यानी केवल करीब 18 प्रतिशत पंचायतों ने ही अपना होमवर्क पूरा किया है, बाकी 82 प्रतिशत पंचायतें अभी भी कागजों में उलझी हैं। इसका सीधा असर केंद्र सरकार से मिलने वाले अनुदान पर पड़ना तय है। 16वें वित्त आयोग से मिलने वाली पहली किस्त पर संशय बरकरार है और पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं।
पंचायत राज संचालनालय ने सभी त्रिस्तरीय पंचायतों को समय सीमा में कार्ययोजना अपलोड करने के निर्देश दिए हैं। सीईओ और जनपद पंचायतों को दिए गए निर्देश में कहा गया है कि ग्राम पंचायत डेवलपमेंट प्लान यानी जीपीडीपी, जनपद पंचायत डेवलपमेंट प्लान यानी बीपीडीपी तथा जिला पंचायत डेवलपमेंट प्लान यानी डीपीडीपी कार्ययोजना अपलोड करने की अंतिम तिथि 15 सितंबर 2026 तय की गई है। पत्र में साफ कहा गया है कि भारत सरकार के पंचायत राज मंत्रालय द्वारा जीपीडीपी, बीपीडीपी और डीपीडीपी को ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पर अपलोड करने की अंतिम तिथि 15 सितंबर 2026 है। इसके बाद पोर्टल पर कार्ययोजना के अनुमोदन की प्रक्रिया बंद कर दी जाएगी। जिन पंचायतों द्वारा तय समय में कार्ययोजना अपलोड नहीं की जाएगी, उन पंचायतों के लिए 16वें वित्त आयोग यानी सीएफसी के अनुदान की पहली किस्त की पात्रता नहीं होगी। इसकी जिम्मेदारी संबंधित पंचायत की होगी।
केंद्र सरकार से मिलने वाले फंड का दूसरे कामों में उपयोग करने वाली पंचायतें अब ग्राम पंचायत डेवलपमेंट प्लान भी समय पर नहीं दे पा रही हैं। इसके चलते इन्हें 16वें वित्त आयोग से मिलने वाले अनुदान की पहली किस्त नहीं मिलने का खतरा बन गया है। इसका सीधा असर पंचायतों में होने वाले सड़क, सामुदायिक विकास समेत अन्य कार्यों पर पड़ना तय है। इसे देखते हुए पंचायत राज संचालनालय ने 15 सितंबर तक पंचायतों को कार्ययोजना अपलोड करने के निर्देश दिए हैं, ताकि अनुदान की किस्त मिलने में दिक्कत नहीं हो। प्रदेश की 23 हजार 11 ग्राम पंचायतों में से अभी तक केवल करीब 18 प्रतिशत पंचायतों ने ही कार्ययोजना अपलोड की है। पंचायत राज संचालनालय के मुताबिक प्रदेश की कुल 23 हजार 11 ग्राम पंचायतों में से अब तक केवल 4 हजार 155 ग्राम पंचायतों ने अपनी विकास कार्ययोजना ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पर अपलोड की है। बड़ी संख्या में पंचायतों को अभी कार्ययोजना अपलोड करना बाकी है।
यदि पंचायतें समय पर योजना नहीं देतीं तो 16वें वित्त आयोग का पैसा रुक जाएगा और गांवों में विकास के काम ठप हो जाएंगे। सड़क, नाली, पेयजल, स्ट्रीट लाइट, सामुदायिक भवन और स्वच्छता जैसे काम इसी अनुदान से होते हैं। फंड न मिलने से ग्रामीणों को मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसना पड़ सकता है। सबसे ज्यादा असर उन पंचायतों पर पड़ेगा, जो पहले से ही पिछड़ी हैं। योजना नहीं तो विकास नहीं, यह नारा अब हकीकत बनता दिख रहा है। हजारों पंचायतों की उदासीनता से ग्रामीण विकास के रास्ते बंद हो सकते हैं।
सिर्फ पंचायतों को दोष देना ठीक नहीं है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं। क्या विभाग ने समय पर प्रशिक्षण दिया? क्या सरपंच-सचिवों को ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पर अपलोड करने की तकनीकी मदद दी गई? कई पंचायतों में इंटरनेट की समस्या है। कई जगह सचिवों के पास कई पंचायतों का प्रभार है। ऐसे में एक व्यक्ति कैसे समय पर योजना बनाएगा? संचालनालय ने विभागों को भी निर्देशित किया है कि कार्ययोजना तैयार करते समय अन्य योजनाओं को पंचायतों की कार्ययोजना में शामिल कराया जाए, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका पालन नहीं हो रहा है।
पंचायतों के पिछड़ने के पीछे जागरूकता की कमी भी एक बड़ा कारण है। कई सरपंचों को पता ही नहीं है कि जीपीडीपी क्या है और इसे क्यों बनाना जरूरी है। तकनीकी ज्ञान की कमी के कारण पोर्टल पर अपलोड करना सचिवों के लिए टेढ़ी खीर बन गया है। समन्वय की कमी भी है। जनपद और जिला पंचायतें ग्राम पंचायतों की मदद नहीं कर रही हैं। लापरवाही के कारण कई पंचायतें सोचती हैं कि फंड तो आ ही जाएगा, योजना बाद में दे देंगे, लेकिन अब केंद्र ने सख्ती कर दी है।
सरकार को तत्काल ब्लॉक स्तर पर शिविर लगाने चाहिए, जहां पंचायतों की योजना बनाने और उसे अपलोड करने में मदद की जाए। सचिवों को अतिरिक्त प्रभार से मुक्त कर एक पंचायत, एक सचिव का नियम लागू करना चाहिए। सरपंचों को प्रशिक्षण देकर जीपीडीपी का महत्व समझाना चाहिए। साथ ही जो पंचायतें समय पर योजना दे रही हैं, उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए और जो नहीं दे रही हैं, उन पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। 15 सितंबर के बाद अनुमोदन बंद करने के बजाय एक मौका और देना चाहिए, ताकि गांवों का विकास न रुके।
ग्राम पंचायत को गांव की सरकार कहा जाता है, लेकिन जब वही सरकार अपनी विकास योजना नहीं बनाएगी तो गांव का विकास कैसे होगा? केंद्र से मिलने वाला फंड कोई खैरात नहीं है, वह गांव के लोगों के हक का पैसा है। उसे पाने के लिए योजना बनाना पहली शर्त है। 18 हजार से ज्यादा पंचायतों की चुप्पी चिंताजनक है। यह केवल आंकड़ा नहीं है, यह ग्रामीण विकास के प्रति उदासीनता की कहानी है। यदि अब भी पंचायतें नहीं जागीं तो सड़क, पानी और रोशनी जैसी बुनियादी सुविधाएं सपना बन सकती हैं। इसलिए जरूरत है कि पंचायतें 15 सितंबर से पहले अपनी कार्ययोजना अपलोड करें और विभाग भी उन्हें हर संभव मदद दे। तभी योजना से विकास का रास्ता खुलेगा।















