भोपाल, 10 सितंबर।
साक्षरता दिवस पर अक्सर चर्चा कागज पर लिखे अक्षरों तक सीमित रह जाती है, लेकिन भोपाल की धरती पर इस बार एक नया अध्याय लिखा गया है, जहां साक्षरता का अर्थ केवल किताब पढ़ना नहीं, बल्कि जीवन को पढ़ना बन गया है। शहर के आसपास की 423 महिलाओं ने जैविक खेती और गृह उद्योग के माध्यम से यह साबित किया है कि जब ज्ञान खेत में उतरता है तो आत्मनिर्भरता की फसल लहलहाती है। यह कहानी किसी सरकारी आंकड़े की नहीं, बल्कि उन महिलाओं की है, जिन्होंने कभी घर की चारदीवारी को ही अपनी दुनिया माना था और आज वे बाजार में अपने उत्पाद का दाम खुद तय कर रही हैं।
कैसे शुरू हुआ बदलाव, सात किसानों से 423 महिलाओं तक का सफर - 2016 में एक छोटे से विचार के साथ भूमिशा ऑर्गेनिक्स की नींव रखी गई थी। शुरुआत में केवल सात किसान जुड़े थे। उद्देश्य था रासायनिक खाद से मुक्त खेती करना, लेकिन धीरे-धीरे इस विचार ने महिलाओं को जोड़ा। प्रशिक्षण शिविरों में उन्हें केवल जैविक खाद बनाना नहीं सिखाया गया, बल्कि यह भी बताया गया कि छोटा उद्योग कैसे शुरू करें, दस्तावेज कैसे तैयार करें, बैंक से संपर्क कैसे करें और अपने उत्पाद को ग्राहक तक कैसे पहुंचाएं। आज इसी प्रयास का परिणाम है कि 423 महिलाएं इस समूह से जुड़ी हैं और उनमें से कई ने अपने छोटे उद्योग शुरू कर दिए हैं।
कागजी साक्षरता से व्यावहारिक साक्षरता की ओर - अक्सर हम साक्षरता को केवल हस्ताक्षर करने या बैंक में पर्ची भरने तक सीमित मान लेते हैं, लेकिन असली साक्षरता वह है, जब महिला यह समझे कि ईएमआई क्या होती है, एनईएफटी और आरटीजीएस में अंतर क्या है, बचत और निवेश में क्या फर्क है और अपने उत्पाद की लागत कैसे निकाली जाती है। भोपाल के इस अभियान में महिलाओं को यही व्यावहारिक शिक्षा दी गई। बैंक प्रणाली में आने वाली घबराहट को दूर किया गया। अब वे खुद अपना खाता संभालती हैं और बैंक अधिकारियों से बिना डर के बात करती हैं।
जैविक खेती बनी रोजगार का जरिया - जैविक खेती केवल पर्यावरण के लिए अच्छी नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के लिए कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाला व्यवसाय भी है। रासायनिक खाद के बढ़ते दामों के बीच गोबर खाद, वर्मी कंपोस्ट और नीम आधारित कीटनाशक ने खेती की लागत को आधा कर दिया है। महिलाओं ने अपने घर के पीछे बंजर पड़ी जमीन पर जैविक सब्जी उगाना शुरू किया। अचार, पापड़ और मसाले बनाकर पैकिंग की और स्थानीय बाजार में बेचना शुरू किया। इससे उन्हें हर महीने अतिरिक्त आमदनी होने लगी और सबसे बड़ी बात यह कि उनके परिवार को शुद्ध भोजन मिलने लगा।
प्रशिक्षण का तरीका, किताब नहीं खेत बना पाठशाला - इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता इसका प्रशिक्षण तरीका है। यहां ब्लैकबोर्ड नहीं, खेत ही पाठशाला है। सुबह के समय महिलाएं खेत में काम करती हैं और दोपहर में उसी खेत के किनारे बैठकर हिसाब-किताब सीखती हैं। उन्हें बताया जाता है कि एक किलो टमाटर की लागत क्या है, बाजार में उसका भाव क्या है और मुनाफा कैसे निकाला जाता है। दस्तावेज कैसे तैयार करें, जीएसटी क्या होता है और ऑनलाइन बिक्री कैसे करें, यह सब भी सरल भाषा में समझाया जाता है।
आत्मविश्वास की नई उड़ान, घर से बाजार तक - पहले जो महिलाएं घर से बाहर निकलने में हिचकती थीं, आज वे समूह बनाकर शहर के हाट बाजारों में स्टॉल लगाती हैं, ग्राहकों से मोलभाव करती हैं और सोशल मीडिया पर अपने उत्पाद की फोटो डालती हैं। कई महिलाओं ने डिजिटल साक्षरता सीखकर अपने उत्पाद को ऑनलाइन बेचना शुरू कर दिया है। यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि सामाजिक भी है। अब गांव में उन्हें केवल किसी की पत्नी या मां के रूप में नहीं, बल्कि एक उद्यमी के रूप में जाना जाता है।
वित्तीय स्वतंत्रता से परिवार में बढ़ा सम्मान - जब महिला अपने पैसों से बच्चों की फीस भरती है या घर के लिए कोई सामान खरीदती है तो परिवार में उसका सम्मान बढ़ता है। पहले जो फैसले केवल पुरुष लेते थे, अब उनमें महिलाओं की भी राय ली जाती है। कई महिलाओं ने बताया कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के बाद उनके पति भी अब खेती में उनकी सलाह मानते हैं। यह छोटा बदलाव ही बड़े सामाजिक परिवर्तन की नींव है।
चुनौतियां भी हैं, लेकिन हौसले बुलंद हैं - रास्ता आसान नहीं है। कई बार उत्पाद समय पर नहीं बिकता तो नुकसान होता है, कई बार बैंक ऋण लेने में कठिनाई आती है, लेकिन समूह की ताकत से वे इन चुनौतियों का सामना करती हैं। एक महिला को परेशानी होती है तो दूसरी मदद के लिए आगे आती है। यही समूह की सबसे बड़ी ताकत है। प्रतिभा तिवारी जैसी मार्गदर्शक ने उन्हें सिखाया है कि असफलता ही सफलता की पहली सीढ़ी है। इसलिए वे हार नहीं मानतीं।
भविष्य की राह, हर गांव में ऐसी पाठशाला हो - भोपाल का यह प्रयोग पूरे मध्यप्रदेश के लिए एक मॉडल बन सकता है। यदि हर जिले में ऐसी व्यावहारिक साक्षरता पाठशाला शुरू की जाए, जहां महिलाओं को अक्षर ज्ञान के साथ-साथ जैविक खेती, वित्तीय प्रबंधन और डिजिटल बिक्री की जानकारी दी जाए तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल सकती है। सरकार को चाहिए कि वह ऐसी पहलों को केवल पुरस्कार देकर नहीं, बल्कि बाजार उपलब्ध कराकर सहयोग करे। जब महिला सीखती है तो पीढ़ियां संवरती हैं। साक्षरता का असली उत्सव तभी है, जब वह एक महिला को आत्मनिर्भर बनाए। भोपाल की 423 महिलाओं ने यह दिखा दिया है कि ज्ञान केवल किताबों में नहीं होता, वह मिट्टी में भी होता है और जब वही ज्ञान हाथों में हुनर बन जाता है तो पूरा समाज बदल जाता है। यह केवल जैविक खेती की कहानी नहीं है, यह महिला सशक्तीकरण की नई परिभाषा है, जहां अक्षर से बाजार तक का सफर तय किया जा रहा है।















