सागर, 10 सितंबर।
सागर जिले के बंडा ब्लॉक में जहरीली शराब से सात और लोगों की मौत के बाद मृतकों की संख्या 25 तक पहुंचना किसी सामान्य प्रशासनिक चूक का मामला नहीं है। यह उन परिवारों की त्रासदी है, जिनके घरों के कमाने वाले सदस्य अब लौटकर नहीं आएंगे। हर ऐसे हादसे के बाद सरकार जांच के आदेश देती है, कुछ कर्मचारियों को निलंबित किया जाता है और कुछ समय बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। सवाल है - क्या निलंबन ही इस गंभीर अपराध की अंतिम सजा है?
जहरीली शराब का कारोबार अचानक नहीं पनपता। इसके लिए अवैध बिक्री, निगरानी की विफलता और स्थानीय स्तर पर संरक्षण का नेटवर्क जिम्मेदार होता है। यदि किसी क्षेत्र में लंबे समय तक अवैध शराब बिकती रही और जिम्मेदार विभागों को इसकी भनक तक नहीं लगी तो जवाबदेही केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जांच का दायरा ऊपर तक जाना चाहिए।
सबसे दुखद यह है कि मरने वालों में बड़ी संख्या गरीब मजदूरों की होती है। चार लाख रुपये का मुआवजा परिवार को तत्काल राहत दे सकता है, लेकिन वह किसी की जान की कीमत नहीं हो सकता। असली सवाल यह है कि अगली मौत कैसे रोकी जाए।
सरकार को इस मामले में दिखावटी कार्रवाई के बजाय पूरे नेटवर्क को उजागर करना होगा। शराब के स्रोत, आपूर्ति श्रृंखला, आर्थिक लेनदेन और संरक्षण देने वालों की जांच हो। दोष सिद्ध होने पर शराब माफिया के साथ जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कठोर कार्रवाई हो। केवल निलंबन या तबादला पर्याप्त नहीं है।
जहरीली शराब से हुई मौतों को महज दुर्घटना मानकर आगे बढ़ जाना प्रशासनिक विफलता को स्थायी बना देगा। यह तय करना होगा कि कानून गरीब की मौत पर ही नहीं, बल्कि उस मौत से मुनाफा कमाने वाले हर व्यक्ति पर समान रूप से लागू हो। बड़े मगरमच्छ कार्रवाई से बाहर रहे तो अगली त्रासदी केवल समय का इंतजार होगी।














