भोपाल, 10 सितंबर।
भोपाल शहर की धड़कन कहे जाने वाले बड़े तालाब के वेटलैंड के अंदर जब सत्ताधारी दल के ही माननीयों के फार्महाउस और पेवर ब्लॉक बनाने की फैक्ट्रियां निकल रही हैं तो फिर भोपाल तालाब को कौन बचाएगा? यह सवाल अब केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि सत्ता के चरित्र का बन गया है। एनजीटी के निर्देश पर चल रहे सर्वे के तीसरे दिन अधिकारियों की टीम को संतनगर में वेटलैंड एरिया के अंदर भाजपा विधायक विष्णु खत्री का आलीशान फार्महाउस मिला। मौके के फोटो और वीडियो तैयार किए गए, जो साफ बता रहे हैं कि निर्माण एफटीएल यानी फुल टैंक लेवल के अंदर है। माननीय ने खुद स्वीकार किया कि फार्महाउस उन्हीं का है और पौने दो एकड़ जमीन पर बना है। उनका दावा है कि पंचायत से अनुमति ली थी, लेकिन सवाल यह है कि क्या पंचायत को वेटलैंड में निर्माण की अनुमति देने का अधिकार है?
सर्वे के दौरान करीब नौ ऐसी जगहें मिलीं, जो पूरी तरह पानी में डूबी हुई थीं। कई स्थानों पर मुनार से पानी की सीमा लगभग पांच से दस फीट आगे तक पहुंची हुई पाई गई। इससे साफ है कि या तो मुनारे गलत लगे हैं या अतिक्रमण पानी के अंदर तक घुस गया है। टीम ने मौके पर प्राइवेट कार गैराज और पेवर ब्लॉक बनाने वाली फैक्ट्री तक जाने का पक्का रास्ता भी देखा है। यह रास्ता तालाब की छाती पर बनाया गया है। केवल मुनारों को आधार मानकर तालाब की सीमा तय करना पर्याप्त नहीं होगा। प्रत्येक मुनारे की सटीक लोकेशन, ऊंचाई, एफटीएल स्तर और वर्तमान जलभराव की स्थिति का वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया जाना जरूरी है।
वेटलैंड तालाब का फेफड़ा होता है। यही वह इलाका है, जहां बरसात का पानी जमा होता है और धीरे-धीरे जमीन में रिसता है। यदि इसी इलाके में फार्महाउस बनेंगे और फैक्ट्री लगेगी तो तालाब की सांस घुट जाएगी। पानी का प्राकृतिक बहाव रुकेगा, तालाब सिकुड़ेगा और शहर में बाढ़ का खतरा बढ़ेगा। पेवर ब्लॉक फैक्ट्री से निकलने वाला सीमेंट और केमिकलयुक्त पानी सीधे तालाब में जाता है, जिससे पानी जहरीला हो रहा है, जलीय जीव मर रहे हैं और भोपाल का पेयजल संकट गहरा रहा है।
तालाब को बचाने के लिए कानून बनाने वाले ही कानून तोड़ रहे हैं तो न्याय कौन करेगा? आम आदमी यदि तालाब किनारे एक झोपड़ी भी बना ले तो नगर निगम का बुलडोजर तुरंत पहुंच जाता है, लेकिन विधायक के फार्महाउस पर सालों से कोई कार्रवाई नहीं हुई। इससे प्रशासन की नीयत पर सवाल उठता है। क्या अधिकारी सत्ता के दबाव में आंखें बंद किए हुए हैं? क्या पंचायत की अनुमति का खेल केवल कागजों में है? हकीकत यह है कि वेटलैंड में किसी भी तरह के निर्माण के लिए पर्यावरण विभाग और एनजीटी की अनुमति जरूरी है। पंचायत को यह अधिकार ही नहीं है।
भोपाल को झीलों की नगरी कहा जाता है, लेकिन एक-एक कर छोटी झीलें खत्म हो चुकी हैं। बड़ा तालाब ही बचा है, जो शहर की प्यास बुझाता है। यदि यही तालाब कब्जे की भेंट चढ़ गया तो भोपाल की पहचान मिट जाएगी। पहले भी भोज वेटलैंड के आसपास अतिक्रमण के मामले सामने आए थे, लेकिन हर बार रिपोर्ट फाइलों में दब गई। इस बार एनजीटी के निर्देश पर सर्वे हो रहा है, इसलिए उम्मीद है कि सच्चाई सामने आएगी।
तालाब को बचाने की जिम्मेदारी कलेक्टर, नगर निगम और मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की है, लेकिन इन विभागों ने कभी भी वेटलैंड की सीमा का वैज्ञानिक सर्वे नहीं कराया। मुनारे कई साल पहले लगे थे। अब कई मुनारे गायब हैं या अपनी जगह से हट गए हैं। सर्वे टीम ने खुद माना है कि मुनारों की स्थिति संदिग्ध है। ऐसे में बिना ड्रोन और सैटेलाइट सर्वे के सही सीमा तय नहीं हो सकती। सवाल यह भी है कि जब फार्महाउस बन रहा था, तब पटवारी, तहसीलदार और नगर निगम के इंजीनियर कहां थे? क्या उन्हें निर्माण दिखाई नहीं दिया या देखकर भी अनदेखा किया गया?
इस खबर के सामने आते ही भोपाल के जागरूक नागरिकों में गुस्सा है। सोशल मीडिया पर फोटो वायरल हो रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि जब सत्ताधारी दल के ही माननीय वेटलैंड में फार्महाउस बनाएंगे तो आम जनता से क्या उम्मीद की जाए? पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यह केवल अतिक्रमण नहीं, बल्कि पर्यावरणीय अपराध है। इसके लिए जिम्मेदार लोगों पर एफआईआर होनी चाहिए। भोपाल के कई संगठनों ने तालाब बचाओ आंदोलन फिर से शुरू करने की चेतावनी दी है।
वेटलैंड के अंदर जितने भी निर्माण हैं, चाहे वे किसी भी बड़े व्यक्ति के हों, उन्हें तुरंत नोटिस देकर ध्वस्त किया जाए। एफटीएल का निर्धारण ड्रोन, लिडार और पुराने नक्शों के आधार पर वैज्ञानिक तरीके से किया जाए। जिन अधिकारियों ने पंचायत स्तर पर अवैध अनुमति दी, उन पर विभागीय कार्रवाई हो। तालाब के चारों ओर सौ मीटर का नो-कंस्ट्रक्शन बफर जोन बनाया जाए। सर्वे रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए, ताकि जनता को पता चले कि तालाब की असली सीमा क्या है।
बड़ा तालाब केवल पानी का स्रोत नहीं है। यह भोपाल की संस्कृति है, यह शहर की सांस है। यदि सत्ता की छांव में ही इसकी हत्या होती रही तो आने वाली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी। जरूरत है कि सरकार बिना दलगत भेदभाव के कार्रवाई करे। विधायक हो या आम आदमी, कानून सबके लिए एक होना चाहिए। तालाब किसी दल का नहीं, पूरे भोपाल का है। इसे बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है। यदि आज हम नहीं जागे तो कल भोपाल की झीलों की कहानी केवल किताबों में रह जाएगी। इसलिए अब वक्त आ गया है कि अतिक्रमण हटे और तालाब को उसका असली स्वरूप लौटाया जाए।















