सतना, 10 सितंबर।
शिक्षा ज्ञान, योग्यता और बेहतर भविष्य की नींव है, लेकिन जब इसी शिक्षा की जगह कागज बेचने का कारोबार शुरू हो जाए तो यह केवल व्यवस्था की कमजोरी नहीं, बल्कि पूरे समाज के भविष्य के लिए गंभीर खतरे की घंटी है। मध्यप्रदेश में दस हजार रुपये में बारहवीं की मार्कशीट और बीस हजार रुपये तक में स्नातक की डिग्री मिलने की शिकायतें सामने आना इसी चिंता को गहरा करता है। सतना से सामने आया फर्जी मार्कशीट का मामला बताता है कि शिक्षा माफिया किस तरह विद्यार्थियों की मजबूरी और उनके सपनों को अपना कारोबार बना रहा है।
फर्जीवाड़े में कई कथित बोर्डों के नाम का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है। दलाल गांव-गांव पहुंचकर कम अंक पाने या परीक्षा में असफल विद्यार्थियों को वैध प्रमाणपत्र का भरोसा देते हैं। उन्हें बताया जाता है कि इन दस्तावेजों से कॉलेज में प्रवेश और आगे नौकरी हासिल की जा सकती है। वास्तविकता तब सामने आती है, जब प्रवेश या नौकरी के दौरान दस्तावेजों का सत्यापन होता है। विद्यार्थी के हाथ में फर्जी कागज रह जाता है, जबकि उसके पैसे, समय और भविष्य पर संकट खड़ा हो जाता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस पूरे खेल में पीड़ित विद्यार्थी और अपराधी के बीच फर्क करना जरूरी है। जो छात्र धोखे में फंसकर पैसा देता है, उसका भविष्य बचाना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है। लेकिन जानबूझकर फर्जी दस्तावेज तैयार करने, बेचने और उनका नेटवर्क चलाने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। यदि दर्जनों फर्जी अंकसूचियां पकड़े जाने के बाद भी यह कारोबार जारी है तो जांच की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इतने बड़े नेटवर्क का संचालन बिना किसी स्तर पर संरक्षण या लापरवाही के संभव है या नहीं, इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
फर्जी मार्कशीट का नुकसान केवल संबंधित विद्यार्थी तक सीमित नहीं रहता। यदि बिना योग्यता के व्यक्ति उच्च शिक्षा हासिल करने या संवेदनशील पेशों में पहुंचने लगे तो उसका असर समाज पर पड़ता है। शिक्षा में कागज को ज्ञान का विकल्प बना देना योग्य विद्यार्थियों के साथ अन्याय है और संस्थानों की विश्वसनीयता को भी कमजोर करता है।
सरकार को इस मामले में तात्कालिक और स्थायी दोनों स्तरों पर कार्रवाई करनी चाहिए। सभी मान्यता प्राप्त बोर्डों के प्रमाणपत्रों के लिए एक केंद्रीय ऑनलाइन सत्यापन व्यवस्था बनाई जाए। निजी और सरकारी संस्थानों में प्रवेश से पहले दस्तावेजों का अनिवार्य डिजिटल सत्यापन हो। फर्जी प्रमाणपत्र बनाने और बेचने वाले गिरोहों की पहचान के लिए पुलिस की विशेष टीम गठित की जाए और धन के लेनदेन से लेकर पूरे नेटवर्क की जांच हो। साथ ही विद्यार्थियों और अभिभावकों को अधिकृत बोर्डों की जानकारी देकर जागरूक किया जाए।
शिक्षा को बाजार में बिकने वाली वस्तु बनने से रोकना सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। दस हजार रुपये में बिकती मार्कशीट वास्तव में कागज की बिक्री नहीं, बल्कि किसी विद्यार्थी के भविष्य और प्रदेश की योग्यता के साथ किया जा रहा सौदा है। इस सौदे को अभी रोकना होगा, क्योंकि शिक्षा की विश्वसनीयता बची रहेगी तभी प्रदेश का भविष्य सुरक्षित रहेगा।














