भोपाल, 11 सितंबर।
भोपाल को झीलों का शहर कहते हैं, लेकिन अब इसे विरोधाभासों का शहर कहना ज्यादा सही होगा। यहां हर कॉलोनी में दो कहानियां एक साथ चल रही हैं। एक कहानी उस परिवार की है, जिसने शांति के लिए मकान लिया था। दूसरी कहानी उस दुकानदार की है, जिसने उसी शांति वाली गली में अपनी दुकान का सपना देखा था। आज दोनों आमने-सामने खड़े हैं और बीच में खड़ा है नगर निगम, जिसके पास दोनों के लिए कोई जवाब नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लो-डेंसिटी क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों पर ताला लगाने की प्रक्रिया शुरू हुई है तो हंगामा लाजिमी था, पर यह हंगामा अचानक नहीं है। यह बरसों से बोए गए बीज का फल है।
गुनहगार व्यापारी या अनुमति देने वाली कलम?सबसे आसान काम है व्यापारी को अवैध करार दे देना। शटर गिरा दो, नोटिस चिपका दो, हो गया न्याय। लेकिन जरा सोचिए, क्या कोई व्यक्ति बिना नक्शा पास कराए, बिना लाइसेंस लिए, बिना बिजली का कमर्शियल कनेक्शन लिए इतनी बड़ी इमारत खड़ी कर सकता है? जवाब है नहीं। कोलार, कलियासोत, नीलबड़, मिसरोद से लेकर बावड़िया तक जो बेतहाशा कंक्रीट का जंगल खड़ा हुआ है, वह रातों-रात नहीं उगा। वह फाइलों पर दस्तखत होने से उगा है। उस फाइल पर दस्तखत किसी व्यापारी ने नहीं, सरकारी कुर्सी पर बैठे अधिकारी ने किए हैं।
सजा सिर्फ दुकानदार को क्यों?जिस कलम ने रिहायशी जमीन पर बाजार बसाने की इजाजत दी, उस कलम से सवाल क्यों नहीं? नगर निगम आज सीलिंग की बात कर रहा है, पर उसे पहले अपनी ही अलमारी में रखी फाइलों को सील करना चाहिए और बताना चाहिए कि 0.06 एफएआर की जमीन पर 6000 वर्गफीट का शोरूम कैसे पास हो गया।
भोपाल की खूबसूरती उसकी खुली जमीनों में थी। लो-डेंसिटी का मतलब ही था कम मकान, ज्यादा हरियाली, ज्यादा सांस लेने की जगह। हमने उसी सांस लेने की जगह पर शोरूम बना दिए। आज हर रिहायशी कॉलोनी में पार्किंग का युद्ध है, पानी की किल्लत है, ट्रैफिक का जाम है। एक तरफ हम कहते हैं शहर स्मार्ट बनेगा और दूसरी तरफ हम बिना प्लानिंग के हर घर को दुकान बना रहे हैं। यह विकास नहीं, विनाश का प्लान है।
ताला या तालमेल?इसका हल सब कुछ बंद कर देना नहीं है। हल है ईमानदार वर्गीकरण। हर दुकान अवैध नहीं होती। एक कॉलोनी में रहने वाले लोगों को दूध, किराना, दवा और क्लिनिक की जरूरत होती है। इन्हें नीड बेस्ड शॉप कहा जाता है और इनकी इजाजत तो मास्टर प्लान में भी है। लेकिन एक शराब की दुकान, एक बड़ा रेस्टोरेंट, एक मैरिज गार्डन और एक छोटे क्लिनिक को एक ही तराजू में तौलना गलत है।
नगर निगम को तीन काम करने होंगे। अतीत की जवाबदेही तय करे कि किन अधिकारियों ने गलत नक्शे पास किए, उन पर कार्रवाई हो। वर्तमान का न्यायपूर्ण बंटवारा करे। जो छोटे और जरूरी व्यवसाय हैं, उन्हें नियमित करे और जो बड़े और शोर-शराबे वाले हैं, उन्हें व्यावसायिक क्षेत्र में शिफ्ट करने का समय दे। भविष्य के लिए नया मास्टर प्लान साफ और सख्त बनाए, जो कागज पर नहीं, जमीन पर लागू हो।
भोपाल को तय करना होगा कि वह क्या बनना चाहता है - एक ऐसा शहर, जहां हर घर के नीचे शटर है या एक ऐसा शहर, जहां घर में सुकून और बाजार में रौनक दोनों बरकरार रहें।














