भोपाल, 11 सितंबर।
फॉरेस्ट कॉलोनी में चार साल की रूबीना के साथ हुई घटना किसी अपराध से कम नहीं है। बड़ी बहन के साथ घर के बाहर खेल रही रूबीना ने एक आवारा कुत्ते के मुंह में बिल्ली देखी तो उसे बचाने आगे बढ़ी। कुत्ते ने उसके चेहरे को नोंच डाला। उसके तीन दांत टूट गए, जबड़े में गंभीर चोट आई और आंख के नीचे गहरे घाव हो गए। यह सिर्फ एक बच्ची की पीड़ा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है, जो नागरिकों को सुरक्षित वातावरण देने में नाकाम साबित हो रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने खतरनाक और आक्रामक कुत्तों को पकड़कर शेल्टर होम में रखने, नसबंदी और टीकाकरण अभियान तेज करने तथा स्कूल, अस्पताल और सार्वजनिक स्थलों के आसपास से कुत्तों को हटाने के निर्देश दिए हैं। इसके बावजूद जमीनी हकीकत चिंताजनक है। अधिकतर नगर निकायों के पास पर्याप्त डॉग कैचर, शेल्टर होम और पशु चिकित्सक तक नहीं हैं। आदेश फाइलों में हैं और कुत्ते सड़कों पर।
स्ट्रीट डॉग्स के प्रबंधन की प्राथमिक जिम्मेदारी स्थानीय निकायों की है। उन्हें नसबंदी, टीकाकरण और निगरानी की प्रभावी व्यवस्था करनी होगी। केवल शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई और बजट या स्टाफ की कमी का बहाना अब स्वीकार्य नहीं हो सकता। दया के नाम पर खुले में भोजन डालने से कुत्तों के झुंड एकत्र होते हैं, वहीं उन्हें क्रूरता से मारना भी समाधान नहीं है।
इस समस्या का रास्ता वैज्ञानिक प्रबंधन से निकलता है। हर नगर निकाय को कुत्तों की संख्या, नसबंदी और हमलों के हॉटस्पॉट का रिकॉर्ड रखना चाहिए। नसबंदी की थर्ड पार्टी ऑडिट हो, हर जिले में शेल्टर की व्यवस्था हो और सरकारी अस्पतालों में एंटी रेबीज वैक्सीन तथा इम्युनोग्लोबुलिन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों। बार-बार शिकायत वाले क्षेत्रों में कार्रवाई न होने पर अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
सरकार स्मार्ट सिटी, मेट्रो और एक्सप्रेस-वे की बात करती है, लेकिन स्मार्ट शहर वही है जहां चार साल की बच्ची अपने घर के बाहर बिना डर के खेल सके। रूबीना का चेहरा हमें याद दिलाता है कि यह मुद्दा कुत्तों के खिलाफ नहीं, लापरवाह सिस्टम के खिलाफ है। अब सरकार और प्रशासन को कागजी आदेशों से निकलकर सड़क पर उतरना होगा, ताकि अगली रूबीना व्यवस्था की शिकार न बने।














