मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दो अलग-अलग मामलों में सरकार को एक ही संदेश दिया है कि कानून में मनमानी नहीं चलेगी। पहला मामला पदोन्नति में आरक्षण की सीमा का है और दूसरा मामला प्रोबेशन में वेतन कटौती का। दोनों ही मामलों में सरकार ने अपनी सुविधा से नियम बनाए थे और दोनों ही मामलों में अदालत को रोक लगानी पड़ी। जबलपुर में हुई सुनवाई में कोर्ट ने कहा कि पदोन्नति में 50 प्रतिशत की सीमा नहीं टूटनी चाहिए और उसकी निगरानी सीधे मुख्य सचिव करेंगे। वहीं दूसरे मामले में 70, 80 और 90 प्रतिशत वेतन देने की व्यवस्था को असंवैधानिक बताते हुए खत्म कर दिया गया है।
पदोन्नति में 50 प्रतिशत की लक्ष्मण रेखा क्यों जरूरी है?आरक्षण सामाजिक न्याय के लिए है, लेकिन उसकी भी एक सीमा है। सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी मामले में यह सीमा 50 प्रतिशत तय की थी। इसका अर्थ यह था कि आरक्षण अपवाद है और अपवाद मूल अधिकार से बड़ा नहीं हो सकता। यदि पदोन्नति में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से ऊपर चली गई तो अनारक्षित वर्ग के लिए अवसर ही नहीं बचेंगे और प्रशासन में संतुलन बिगड़ जाएगा। इसी संतुलन को बचाने के लिए जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस विनय सराफ की बेंच ने अंतरिम निर्देश दिया कि किसी भी विभाग में पदोन्नति के दौरान 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन न हो।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज शर्मा ने कहा कि सरकार लगातार पदोन्नतियां कर रही है। एक बार पदोन्नति हो गई तो कर्मचारियों को मूल पद पर वापस भेजना अत्यंत कठिन हो जाता है। इससे उनके अधिकार प्रभावित होते हैं। यह डर वास्तविक है, क्योंकि पदोन्नति केवल कुर्सी नहीं बदलती, वह वरिष्ठता, वेतन और भविष्य की पदोन्नति भी तय करती है। यदि गलत पदोन्नति हो गई तो उसे सुधारने में वर्षों लग सकते हैं। इसलिए अदालत ने समय रहते रोक लगाई और कहा कि पहले सीमा का पालन करो, फिर पदोन्नति करो।
मुख्य सचिव को निगरानी क्यों सौंपी गई?अदालत ने निगरानी की जिम्मेदारी सीधे मुख्य सचिव को सौंपी है। यह केवल प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि जवाबदेही तय करने का तरीका है। अक्सर विभाग अपने स्तर पर रोस्टर बनाते हैं और आरक्षण की गणना में गलती कर देते हैं। कई बार जानबूझकर सीमा तोड़ दी जाती है। यदि मुख्य सचिव के पास निगरानी होगी तो हर फाइल उन तक जाएगी और कोई विभाग यह नहीं कह पाएगा कि उसे जानकारी नहीं थी। यह आदेश बताता है कि अदालत अब केवल निर्देश नहीं देना चाहती, बल्कि उसका पालन भी सुनिश्चित कराना चाहती है।
दिसंबर 2019 में सरकार ने चार साल की प्रोबेशन व्यवस्था बनाई थी। पहले साल 70 प्रतिशत, दूसरे साल 80 प्रतिशत, तीसरे साल 90 प्रतिशत और उसके बाद पूरा वेतन देने की व्यवस्था थी। सरकार का तर्क था कि इससे प्रशिक्षण होगा और वित्तीय अनुशासन रहेगा। लेकिन हकीकत में कर्मचारी से पूरा काम लिया जा रहा था। वह पूरी फाइल निपटा रहा था, पूरा फील्ड वर्क कर रहा था और वेतन आधा-अधूरा पा रहा था। एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की बेंच ने कहा कि जब काम पूरा लिया जा रहा है तो वेतन पूरा क्यों? यह समान कार्य के लिए असमान वेतन है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ है।
अदालत ने एक और तथ्य पकड़ा कि लोक सेवा आयोग से नियुक्त अधिकारियों को शुरू से पूरा वेतन दिया जा रहा था, जबकि कर्मचारी चयन मंडल से नियुक्त कर्मचारियों को कम वेतन दिया जा रहा था। एक ही सरकार में दो नियम कैसे हो सकते हैं? यह भेदभाव है। पीएससी और ईएसबी दोनों ही सरकारी चयन एजेंसियां हैं। दोनों से चयनित व्यक्ति सरकार का ही कर्मचारी है, फिर वेतन में भेद क्यों? अदालत ने कहा कि यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है और 25 नवंबर 2019 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को पूरा वेतन देना होगा।
आरक्षण और वेतन दोनों ही सरकार के लिए परीक्षा हैं। आरक्षण में सरकार को यह सोचना होता है कि किसे कितना प्रतिनिधित्व देना है और वेतन में यह सोचना होता है कि किसे कितना सम्मान देना है। यदि आरक्षण की सीमा टूटती है तो एक वर्ग को लगता है कि उसके साथ अन्याय हो रहा है। यदि वेतन कटता है तो नए कर्मचारी को लगता है कि उसके साथ शोषण हो रहा है। दोनों ही स्थितियों में भरोसा टूटता है। हाईकोर्ट ने भरोसा बचाने का काम किया है।
50 प्रतिशत की सीमा तोड़ने से रोस्टर बिगड़ता है और वरिष्ठता सूची पर मुकदमे बढ़ते हैं। मध्य प्रदेश में पिछले दस साल में पदोन्नति को लेकर सैकड़ों याचिकाएं दायर हुई हैं। हर याचिका सरकार का समय और पैसा खर्च कराती है। यदि शुरू में ही सीमा का पालन हो जाए तो मुकदमे कम होंगे। तथ्य यह भी है कि प्रोबेशन में वेतन कटौती से युवा नौकरी छोड़ने पर मजबूर होते हैं। कई युवा प्रतियोगी परीक्षाओं में चयन के बाद भी कम वेतन के कारण नौकरी नहीं लेते। इससे विभागों में पद खाली रह जाते हैं। पूरा वेतन देने से युवा टिकेगा और प्रशासन मजबूत होगा।
सरकार के सामने अब तीन रास्ते हैं। पहला रास्ता है कि वह हाईकोर्ट के आदेश का पालन करे और मुख्य सचिव के नेतृत्व में एक निगरानी प्रकोष्ठ बनाए, जो हर विभाग की पदोन्नति की जांच करे। दूसरा रास्ता है कि प्रोबेशन वाले कर्मचारियों के बकाया वेतन का भुगतान करे और भविष्य के लिए नियम में संशोधन करे। तीसरा रास्ता है कि सुप्रीम कोर्ट में अपील करे। लेकिन अपील से पहले सरकार को यह सोचना होगा कि क्या वह समानता के सिद्धांत के खिलाफ खड़ी होना चाहती है।
सीमा में ही सुरक्षा है और समानता में ही सम्मान है। हाईकोर्ट के दोनों आदेश एक ही दिशा में इशारा करते हैं कि सरकार को अपने कर्मचारियों के साथ न्याय करना चाहिए। आरक्षण की सीमा तय करना आरक्षण को खत्म करना नहीं, बल्कि उसे बचाना है और पूरा वेतन देना वित्तीय बोझ नहीं, बल्कि कर्मचारी के सम्मान की रक्षा है। यदि सरकार इन दोनों बातों को समझ लेती है तो न तो पदोन्नति में विवाद होगा और न ही प्रोबेशन में निराशा। यही अच्छे प्रशासन की पहचान है कि वह अपने लोगों को अवसर भी दे और सम्मान भी।















