काठमांडू, 3 अक्टूबर।
नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया है कि यदि कोई विधवा महिला पुनर्विवाह करती है, तो उसे पहले पति से हिस्से में मिली संपत्ति अपनी संतान को सौंपना अब अनिवार्य नहीं होगा। मुलुकी देवानी संहिता, 2074 की धारा 214 की उपधारा (2) के अंतर्गत यह प्रावधान था कि विधवा के दोबारा विवाह करने पर पहली संतान को संपत्ति लौटानी होगी, जिसे अदालत ने संविधान के समानता, संपत्ति और सम्मानपूर्वक जीने के अधिकारों के विपरीत मानते हुए पूरी तरह से खारिज कर दिया है। न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल के नेतृत्व वाली संवैधानिक पीठ द्वारा यह निर्णय सुनाया गया, जिसमें महिला कानून और विकास मंच की अधिवक्ता मीरा ढुंगाना की ओर से दायर रिट याचिका पर विचार करते हुए कहा गया कि यह कानून लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देने वाला था। अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में यह भी जोड़ा कि अंशदान या संपत्ति का अधिकार किसी की खैरात नहीं बल्कि जन्मसिद्ध अधिकार है, और पति की मृत्यु के बाद मिलने वाली संपत्ति पर महिला का पूर्ण निजी स्वामित्व होता है, जिसे केवल दूसरी शादी करने के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।
सरकार की ओर से बच्चों की आर्थिक सुरक्षा और अभिभावकहीनता की स्थिति का हवाला देते हुए इस नियम का बचाव किया गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन तर्कों को खारिज करते हुए माना कि केवल विधवा की वैवाहिक स्थिति और संपत्ति अधिकारों पर इस तरह के प्रतिबंध लगाना असंवैधानिक और भेदभावपूर्ण है। अदालत ने कहा कि कानून विधायिका द्वारा बनाए जाते हैं, परंतु वे कभी भी संविधान की सीमाओं और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकते। इस प्रकार, पुरुषों और महिलाओं के बीच संपत्ति के मामलों में मौजूद असमानता को चुनौती देने वाली इस याचिका पर अदालत ने बड़ा फैसला देकर देश की विधवा महिलाओं को बड़ी राहत प्रदान की है और पूर्ववर्ती संहिता के प्रावधानों को निष्प्रभावी कर दिया है।














