नई दिल्ली, 26 अक्टूबर।
दुनिया तेजी से अपनी हरियाली खो रही है। जंगल सिकुड़ रहे हैं, नदियां सूख रही हैं और जीवों की कई प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। भारत इस मामले में सबसे समृद्ध देशों में से एक है। यहां हिमालय से लेकर थार रेगिस्तान तक और पश्चिमी घाट से लेकर सुंदरबन तक हर तरह की जैव विविधता मिलती है, लेकिन इस अमूल्य खजाने को बचाने में हमारी रफ्तार बेहद सुस्त है।
कानून बने, बोर्ड बने, कमेटियां बनीं, रजिस्टर बने, लेकिन जब बात आती है जमीन पर किसी क्षेत्र को जैव विविधता विरासत स्थल घोषित करने की, तो आंकड़ा निराश करता है। पूरे देश में अब तक केवल 54 स्थल ही इस श्रेणी में आ पाए हैं, जबकि संभावनाएं हजारों की हैं।
भारत ने 2002 में जैव विविधता कानून पारित किया था और 2003 में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण की स्थापना हुई थी। इसका मकसद था कि देश की जैव संपदा को पहचाना जाए, उसका दस्तावेजीकरण हो और उसे बचाया जाए। आज देश के 28 राज्यों में जैव विविधता बोर्ड बने हुए हैं। दो लाख 71 हजार से अधिक जैव विविधता प्रबंधन समितियां गांवों और शहरों में काम कर रही हैं। दो लाख 68 हजार से अधिक लोक जैव विविधता रजिस्टर तैयार हो चुके हैं, जो अपने आप में एक बड़ा रिकॉर्ड है।
लेकिन इतने बड़े तंत्र के बाद भी विरासत स्थल घोषित करने की गति कछुए जैसी है। कई राज्यों में एक भी स्थल घोषित नहीं हुआ है। इससे साफ पता चलता है कि हमारा ध्यान कागजी खानापूर्ति पर अधिक है और जमीन पर काम पर कम है।
54 स्थल पूरे भारत जैसे विशाल देश के लिए बहुत छोटा आंकड़ा है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा, बिहार, पंजाब, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड जैसे बड़े राज्यों में एक भी स्थल घोषित नहीं है। यह केवल आंकड़ा नहीं है, बल्कि हमारी मानसिकता का प्रतीक है। राजस्थान में ओरण हैं, जिन्हें गांव के लोग सदियों से पवित्र मानकर बचाते आए हैं। मध्यप्रदेश में कई पवित्र वन हैं, जहां आदिवासी समाज ने पेड़ों को देवता मानकर सुरक्षित रखा है। उत्तराखंड में बुग्याल हैं, जो दुर्लभ वनस्पतियों का घर हैं। इन सबके बावजूद वहां एक भी विरासत स्थल नहीं है, तो सवाल उठता है कि आखिर कमी कहां है?
अक्सर लोग समझते हैं कि विरासत स्थल का मतलब कोई बड़ा जंगल या राष्ट्रीय उद्यान है, लेकिन ऐसा नहीं है। जैव विविधता विरासत स्थल वह कोई भी क्षेत्र हो सकता है, जहां विशेष प्रकार के पौधे, जीव या पारिस्थितिकी तंत्र मौजूद हों। वह जमीन सरकारी, निजी या सामुदायिक हो सकती है। यहां तक कि किसी गांव का छोटा तालाब भी विरासत स्थल बन सकता है, यदि वहां दुर्लभ प्रजातियां रहती हैं। इसका उद्देश्य है कि उस क्षेत्र को कानूनी सुरक्षा मिले, वहां किसी भी तरह का विनाशकारी निर्माण या खनन न हो और वहां के स्थानीय लोगों को उसके संरक्षण का लाभ मिले।
जब किसी स्थल को विरासत स्थल घोषित किया जाता है, तो वहां के युवाओं और बच्चों में गर्व की भावना आती है। वे अपनी धरती से जुड़ते हैं और उसे बचाने के लिए आगे आते हैं। जानकारी का अभाव एक बड़ी समस्या है। अधिकांश ग्राम पंचायतों को पता ही नहीं है कि वे अपने क्षेत्र को विरासत स्थल घोषित करने के लिए प्रस्तावित कर सकती हैं। प्रबंधन समितियां बनी तो हैं, लेकिन उन्हें प्रशिक्षण नहीं मिला है। किसी क्षेत्र को विरासत स्थल घोषित करने के लिए वैज्ञानिक सर्वेक्षण और वनस्पति एवं जीव वैज्ञानिकों की रिपोर्ट चाहिए, जो हर जिले में उपलब्ध नहीं है।
राजनीतिक और प्रशासनिक उदासीनता भी एक बड़ी बाधा है। विरासत स्थल घोषित होने के बाद उस जमीन पर उद्योग या रियल एस्टेट का दबाव आसानी से नहीं चल सकता। इसीलिए कई बार स्थानीय स्तर पर ही प्रस्ताव को रोक दिया जाता है। वित्तीय मदद का अभाव भी समस्या है। केंद्र से पैसा आता है, लेकिन वह प्राधिकरण और बोर्ड तक ही सीमित रह जाता है। नीचे पंचायत स्तर तक नहीं पहुंचता। इसीलिए समितियां केवल रजिस्टर बनाकर अपना काम खत्म मान लेती हैं।
यदि हमने विरासत स्थलों को तेजी से घोषित नहीं किया, तो सबसे बड़ा नुकसान हमारी आने वाली पीढ़ी को होगा। कई औषधीय पौधे, जो आज हमारे जंगलों में हैं, कल खत्म हो जाएंगे। कई जीव, जिनके बारे में हमने अभी जाना भी नहीं है, वे बिना पहचाने ही विलुप्त हो जाएंगे।
जलवायु परिवर्तन का संकट भी बढ़ेगा। ये छोटे-छोटे विरासत स्थल ही कार्बन को सोखते हैं, भूजल को बचाते हैं और बाढ़ तथा सूखे के प्रभाव को कम करने में मदद करते हैं। यदि ये खत्म हुए, तो गांवों की जल सुरक्षा भी प्रभावित होगी। सबसे बड़ा नुकसान सांस्कृतिक होगा। आदिवासी समाज की जो परंपरागत ज्ञान प्रणाली पवित्र वनों को बचाती है, वह भी इन स्थलों के साथ खत्म हो सकती है।
सरकार को सबसे पहले हर राज्य के लिए लक्ष्य तय करना होगा कि अगले दो वर्षों में कम से कम दस विरासत स्थल घोषित किए जाएं। ग्राम पंचायतों और नगर निकायों को जागरूक करने के लिए अभियान चलाना होगा। उन्हें बताया जाए कि विरासत स्थल घोषित होने से संरक्षण के लिए अनुदान, रोजगार के अवसर और क्षेत्र को पहचान मिल सकती है।
विश्वविद्यालयों को इस काम में जोड़ना होगा। छात्र अपने क्षेत्र के तालाब, जंगल या पवित्र स्थल का सर्वेक्षण कर सकते हैं और उसकी रिपोर्ट प्राधिकरण को भेज सकते हैं। इससे युवा भी जुड़ेंगे और वैज्ञानिक आंकड़े भी तैयार होंगे। वित्तीय मदद सीधे प्रबंधन समितियों को दी जाए, ताकि वे छोटी नर्सरी, जैव विविधता पार्क या संग्रहालय बना सकें। स्थानीय समुदाय को सबसे बड़ा भागीदार बनाया जाए, खासकर महिलाओं और आदिवासी बुजुर्गों को, क्योंकि वही असली संरक्षक हैं।
जैव विविधता विरासत स्थल केवल सरकारी योजना नहीं है, यह हमारी जीवनशैली का हिस्सा है। भारत में प्रकृति को हमेशा देवता माना गया है। पीपल, बरगद, नदी और पहाड़, सब पूज्य रहे हैं। उसी परंपरा को आधुनिक कानून का रूप देना है। 54 स्थलों से हम दुनिया को अपनी समृद्धि नहीं दिखा सकते। हमें सैकड़ों स्थलों को पहचानना होगा और उन्हें गर्व के साथ दुनिया के सामने रखना होगा। यदि आज हम चूके, तो कल हमारे पास केवल रजिस्टरों में नाम बचेंगे, जमीन पर हरियाली नहीं बचेगी। समय आ गया है कि कागजी समितियों से निकलकर जमीन पर उतरा जाए और हर गांव की हरियाली को विरासत स्थल का सम्मान दिया जाए। यही भविष्य के लिए सच्ची पूंजी होगी।














