भोपाल, 26 अक्टूबर।
महिलाओं पर बढ़ते अपराधों की खबर केवल भोपाल तक सीमित नहीं है। यह दिल्ली से लेकर कोलकाता और मुंबई से लेकर छोटे कस्बों तक की हकीकत है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि देश में हर साल महिलाओं के खिलाफ चार लाख से ज्यादा मामले दर्ज होते हैं। इनमें घरेलू हिंसा, अपहरण, शील भंग, दुष्कर्म और साइबर अपराध प्रमुख हैं।
पहले अपराध सड़क पर दिखाई देते थे, अब वे मोबाइल फोन और घर की चारदीवारी के भीतर भी पहुंच गए हैं। इसीलिए पुलिस की रणनीति भी बदल रही है। अब केवल डंडे और गश्त से काम नहीं चलेगा, बल्कि संवाद, तकनीक और त्वरित न्याय की जरूरत है।
पहले दहेज हत्या और अपहरण के मामले ज्यादा चर्चा में रहते थे, लेकिन अब साइबर अपराध, घरेलू प्रताड़ना और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार जैसी चुनौतियां भी सामने हैं। फोटो मॉर्फिंग, ब्लैकमेलिंग और फर्जी प्रोफाइल के जरिए महिलाओं को परेशान किया जाता है। घर के भीतर मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना भी गंभीर समस्या है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों ने महिला सुरक्षा के लिए विभिन्न योजनाएं शुरू की हैं।
वर्ष 2012 के बाद महिला सुरक्षा को लेकर देशभर में सोच बदली है। केंद्र सरकार ने निर्भया फंड बनाया। वन स्टॉप सेंटर यानी सखी केंद्रों के माध्यम से पीड़िताओं को पुलिस, कानूनी सहायता, चिकित्सा और परामर्श जैसी सुविधाएं एक ही स्थान पर उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है। महिला हेल्पलाइन 181 और आपातकालीन सेवा 112 भी सहायता के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। महिलाओं के खिलाफ गंभीर अपराधों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट और बड़े शहरों में सीसीटीवी, कंट्रोल रूम तथा निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने की पहल हुई है।
पुलिस प्रशासन भी अब केवल एफआईआर दर्ज करने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि अपराधों की रोकथाम पर जोर दे रहा है। महिला थाने, महिला हेल्प डेस्क, शक्ति टीम और पिंक पेट्रोलिंग इसी सोच के उदाहरण हैं। उत्तर प्रदेश में मिशन शक्ति, महाराष्ट्र में दामिनी पथक और मध्यप्रदेश में शक्ति तथा शौर्या दल के माध्यम से महिलाओं की सुरक्षा के प्रयास किए जा रहे हैं। कॉलेजों में संवाद और जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए छात्राओं को साइबर सुरक्षा, कानूनी अधिकारों और आत्मरक्षा की जानकारी देने पर भी जोर दिया जा रहा है।
तकनीक ने महिला सुरक्षा के प्रयासों को नया आधार दिया है। सीसीटीवी नेटवर्क, साइबर सेल, मोबाइल ऐप और सोशल मीडिया निगरानी के माध्यम से अपराधों पर नियंत्रण की कोशिश हो रही है। डायल 112 पर सूचना मिलने के बाद पुलिसकर्मियों को घटनास्थल तक पहुंचाने के लिए जीपीएस जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है।
महिलाओं के खिलाफ अपराधों के बढ़ते आंकड़ों को केवल पुलिस की नाकामी का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। पहले शर्म और डर के कारण कई महिलाएं शिकायत नहीं करती थीं, लेकिन जागरूकता और सहायता सेवाओं के विस्तार से रिपोर्टिंग बढ़ी है। फिर भी यह चिंता बनी हुई है कि मामलों के निपटारे में देरी और दोषियों को सजा मिलने में लगने वाला समय पीड़िताओं के लिए बड़ी चुनौती है।
महिला सुरक्षा के लिए न्यायिक प्रक्रिया तेज करनी होगी, पुलिस में महिलाओं की संख्या बढ़ानी होगी और स्कूलों में लैंगिक समानता तथा सहमति के प्रति जागरूकता विकसित करनी होगी। साइबर साक्षरता और घरेलू हिंसा से प्रभावित महिलाओं के लिए परामर्श सेवाओं को भी मजबूत करना जरूरी है।
महिलाओं की सुरक्षा केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सोच का विषय है। भोपाल में दर्ज 2,801 मामले भी गंभीर चिंता का संकेत हैं। पुलिस का थाने से निकलकर कॉलेजों तक पहुंचना सकारात्मक पहल है, लेकिन इन प्रयासों की सफलता उनके निरंतर क्रियान्वयन और प्रभावी परिणामों पर निर्भर करेगी। जब हर बेटी यह महसूस करेगी कि रात के बारह बजे भी वह सड़क पर सुरक्षित है और थाने में उसकी शिकायत सुनी जाएगी, तभी हम वास्तव में सुरक्षित समाज का दावा कर सकेंगे।














