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संपादकीय
26 Oct, 2026

इंटरनेट की आजादी और सुरक्षा आमने-सामने: बच्चों का इंटरनेट मौलिक अधिकार या खतरा

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के लिए इंटरनेट को मौलिक अधिकार मानते हुए पाबंदी के बजाय संतुलित और मजबूत डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था अपनाने पर जोर दिया है।

नई दिल्ली, 26 अक्टूबर।

ऐसे दौर में, जब ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस व अन्य विकसित देशों में सोशल मीडिया तक बच्चों की पहुंच सीमित करने के कानून बने हैं, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बच्चों की इंटरनेट तक पहुंच उनका मौलिक अधिकार है और इस पर प्रतिबंध लगाना अनुचित है। कोर्ट ने माना कि इंटरनेट तक पहुंच और उसके इस्तेमाल का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के साथ-साथ अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत निर्धारित वाक् एवं अभिव्यक्ति की आजादी में ही निहित है।

यह टिप्पणी साधारण नहीं है। दरअसल, न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. वी. चंद्रन की पीठ इंटरनेट के जरिये बच्चों के शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री का पता लगाने और उसे हटाने के उपायों पर विमर्श कर रही थी। इसी बीच, कई देशों द्वारा एक निर्धारित उम्र तक के बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच सीमित करने का मामला सामने आया। भारत में भी इस तरह के प्रतिबंध लगाने की मांग की जा रही है। अदालत का मानना था कि हम बच्चों से जुड़ी ऐसी चिंताओं को स्वीकार करते हैं, लेकिन इंटरनेट पर प्रतिबंध इसका न्यायोचित विकल्प नहीं है।

शीर्ष अदालत ने माना कि इस माध्यम से बच्चों को दूर रखकर हम उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकते। अदालत का तर्क था कि बच्चों की आजादी और सुरक्षा एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि उन्हें दोनों ही चीजें मिलनी चाहिए। यह सबसे महत्वपूर्ण बात है। अक्सर हम सोचते हैं कि या तो आजादी दो या सुरक्षा, दोनों एक साथ नहीं हो सकतीं। लेकिन कोर्ट ने कहा कि ऐसा नहीं है, दोनों साथ होनी चाहिए। नई पीढ़ी के बच्चों के लिए इंटरनेट सीखने का माध्यम भी है। दूरदराज के इलाकों में जानकारी पाने का यह एकमात्र जरिया होता है।

यदि हम शहर के बच्चे को देखें, तो उसके पास स्कूल, लाइब्रेरी, कोचिंग, सब कुछ है, लेकिन बस्तर के किसी गांव या लद्दाख के किसी गांव के बच्चे के लिए इंटरनेट ही उसकी क्लास है, वही उसका पुस्तकालय है। ऐसे में उससे इंटरनेट छीन लेना उसे शिक्षा से वंचित करने जैसा होगा।

वहीं दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट ने इस बात का गंभीरता से संज्ञान लिया कि देश में नाबालिगों से जुड़ी अश्लील सामग्री रोकने में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लापरवाही दिखा रहे हैं। अदालत का मानना था कि सभी हितधारक यह सुनिश्चित करें कि बच्चों को हानि पहुंचाने वाली कोई भी सामग्री प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उपलब्ध न हो सके। यह सामग्री न अपलोड की जाए और न ही उसे प्रोत्साहित किया जाए। कोर्ट ने इस बात को लेकर भी नाराजगी जताई कि मध्यस्थों और सोशल मीडिया मंचों ने वर्ष 2024 में जारी किए गए कोर्ट के निर्देशों का ईमानदारी से पालन नहीं किया। साथ ही, पीठ का मानना था कि आज इंटरनेट शिक्षा, सूचना और सामाजिक भागीदारी का एक सशक्त माध्यम बना है। ऐसे में यदि प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो वे निष्प्रभावी होंगे, बल्कि नुकसान पहुंचाने वाले भी हो सकते हैं।

इसका नुकसान यह हो सकता है कि बच्चे ऐसी ऑनलाइन जगहों को खोजना शुरू कर सकते हैं, जहां नियम-कानून कम होने की वजह से खतरे अधिक हों। यह भी स्पष्ट किया गया कि केवल प्रतिबंध लगाने से समस्या खत्म नहीं होती, बल्कि और बढ़ सकती है।

विदेशों में प्रतिबंध, भारत में संतुलन। ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का कानून बनाया है। फ्रांस में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य की गई है। इन देशों का तर्क है कि सोशल मीडिया से बच्चों में अवसाद, चिंता और आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है।

लेकिन भारत की परिस्थिति अलग है। यहां डिजिटल डिवाइड अभी भी बड़ा है। कई बच्चों के लिए स्मार्टफोन ही पहला स्कूल है। कोरोना काल में हमने देखा कि कैसे इंटरनेट ने शिक्षा को बचाए रखा। यदि हमने प्रतिबंध लगा दिया, तो सबसे अधिक नुकसान गरीब, आदिवासी और ग्रामीण बच्चों को होगा, जो पहले से ही शिक्षा में पीछे हैं। सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण इसी भारतीय हकीकत को समझता है। कोर्ट का कहना है कि खतरे से आंखें बंद करके बच्चों को कमरे में बंद करना समाधान नहीं है, बल्कि उन्हें खतरे को पहचानना और उससे लड़ना सिखाना समाधान है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि इंटरनेट पर सब कुछ सुरक्षित है। खतरा बहुत बड़ा है। नाबालिगों से जुड़ी अश्लील सामग्री, चाइल्ड ग्रूमिंग, साइबर बुलिंग और गेमिंग की लत, ये सभी असली खतरे हैं। कई बार बच्चे अनजाने में ऐसी सामग्री देख लेते हैं, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालती है।

लेकिन इसका हल प्रतिबंध नहीं, बल्कि बेहतर सुरक्षा कवच है। जैसे घर में चाकू से खतरा है, तो हम चाकू को घर से फेंक नहीं देते, बल्कि बच्चों को उसे संभालकर इस्तेमाल करना सिखाते हैं और सुरक्षित जगह पर रखते हैं। वैसे ही इंटरनेट के साथ भी करना होगा। सोशल मीडिया कंपनियों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित फिल्टर लगाने होंगे, जो नाबालिगों से जुड़ी अश्लील सामग्री को अपलोड होते ही हटा दें और अपलोड करने वाले का अकाउंट ब्लॉक कर दें। अभी कंपनियां केवल शिकायत आने पर कार्रवाई करती हैं, जबकि उन्हें सक्रिय रूप से निगरानी और कार्रवाई करनी होगी।

माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। केवल स्कूल को दोष देने से काम नहीं होगा, घर में भी डिजिटल साक्षरता जरूरी है। माता-पिता को पता होना चाहिए कि बच्चा क्या देख रहा है और किससे बात कर रहा है। इसके लिए उन्हें पैरेंटल कंट्रोल टूल का इस्तेमाल करना सीखना होगा।

कानून का सख्त पालन भी जरूरी है। भारत में पॉक्सो एक्ट और आईटी एक्ट के तहत बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री को लेकर सख्त सजा का प्रावधान है, लेकिन सजा तभी होगी, जब अपराधियों को पकड़ा जाएगा। पुलिस की साइबर सेल को और मजबूत करना होगा और प्लेटफॉर्म को डेटा उपलब्ध कराने के लिए बाध्य करना होगा। स्कूलों में डिजिटल नैतिकता की पढ़ाई भी जरूरी है। जैसे हम बच्चों को सड़क पर चलने के नियम सिखाते हैं, वैसे ही इंटरनेट पर चलने के नियम भी सिखाने होंगे। क्या साझा करना है, क्या नहीं, किस लिंक पर क्लिक नहीं करना है और किस अनजान व्यक्ति से बात नहीं करनी है, यह सब पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि यह केवल सरकार या परिवार की जिम्मेदारी नहीं है। सभी हितधारकों को मिलकर काम करना होगा। सरकार को नियम बनाने होंगे, कंपनियों को उनका पालन करना होगा और परिवार को जागरूक होना होगा। यदि कंपनियां वर्ष 2024 के निर्देशों का पालन नहीं करती हैं, तो उन पर भारी जुर्माना लगाया जाना चाहिए और जरूरत पड़ने पर उनके अधिकारियों पर आपराधिक मामले भी चलाए जाने चाहिए, क्योंकि बच्चों की सुरक्षा से बड़ा कोई बिजनेस नहीं हो सकता।

सुप्रीम कोर्ट का यह दृष्टिकोण दूरदर्शी है। यह कहता है कि 21वीं सदी में इंटरनेट कोई विलासिता नहीं, बल्कि जीवन की जरूरत है। इसे बच्चों से छीनना उन्हें भविष्य से काटने जैसा है। हमें ऐसा इंटरनेट बनाना होगा, जो स्वतंत्र भी हो और सुरक्षित भी, जहां बच्चा खुलकर सीख सके, सवाल पूछ सके और अपनी प्रतिभा दिखा सके, लेकिन जहां कोई शिकारी उसकी मासूमियत का फायदा न उठा सके।

आजादी और सुरक्षा एक सिक्के के दो पहलू हैं। एक के बिना दूसरा अधूरा है। यदि हम बच्चों को केवल सुरक्षा के नाम पर पिंजरे में बंद करेंगे, तो वे उड़ना भूल जाएंगे और यदि केवल आजादी देकर खुला छोड़ देंगे, तो वे भटक जाएंगे। इसलिए जरूरत है संतुलित दृष्टिकोण की, जहां आजादी भी मिले और सुरक्षा भी। यही वह रास्ता है, जो भारत को डिजिटल दुनिया में एक आदर्श बना सकता है, जहां तकनीक डर नहीं, बल्कि ताकत बने।

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