जीवन परमात्मा का दिया हुआ सबसे अमूल्य उपहार है मानव जाति को। जीवन को एक यात्रा के समान कहा गया है, जिसमें जीवन पथ पर हमें हर हाल में चलना है। हर यात्रा का एक अंत होना चाहिए, या यूं कहें एक उद्देश्य, एक लक्ष्य होना चाहिए।
अब सवाल उठता है—हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है? क्या यह महज चलते जाना है? जन्म से मृत्यु तक सांसारिक सुख-सुविधाएं, पद, पैसा, प्रतिष्ठा, मान-अपमान, यश-अपयश—क्या यही जीवन का उद्देश्य है? हम सामान्यतः यही समझ लेते हैं, लेकिन यह अधूरा है।
जन्म के समय हमारी कोई निश्चित सोच नहीं होती, लेकिन समय के साथ हम जीवन को अधिक आरामदायक बनाने, सुख-सुविधाएं जुटाने, संपत्ति बनाने और धन अर्जित करने में लग जाते हैं। धीरे-धीरे यही हमारी प्राथमिकता बन जाती है।
जबकि जीवन का एक निश्चित पड़ाव है—मृत्यु, जहां हम कुछ भी साथ नहीं ले जा सकते। मानव जीवन क्षणभंगुर है, जल के बुलबुले के समान।
समयानुसार हम सभी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। मृत्यु अटल सत्य है—यही हमारी यात्रा का अंतिम पड़ाव है।
"सब ठाठ पड़ा रह जाएगा, जब लौट चलेगा बंजारा।"
लेकिन सवाल यह है—क्या हम यूं ही चले जाएं, बिना कुछ किए? सिर्फ "मेरा-तेरा" में जीवन समाप्त कर दें?
नहीं। मानव जीवन केवल जीने के लिए नहीं है, बल्कि समझने और साधने के लिए है। भारत की भूमि पर अनेक मनीषियों ने गहन चिंतन कर निष्कर्ष निकाला कि मानव जीवन का उद्देश्य है—सत्य की व्यक्तिगत खोज।
आज हम भौतिक सुख-सुविधाओं में इतने उलझ गए हैं कि अध्यात्म से दूर होते जा रहे हैं, जबकि दुनिया अब उसी की ओर लौट रही है।
अभी भी देर नहीं हुई है। विशेष रूप से युवाओं को समझना होगा कि जीवन का लक्ष्य केवल जीना नहीं, बल्कि धर्मसम्मत और सार्थक जीवन जीना है। सादा जीवन और उच्च विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
हम ऐसा जीवन जिएं कि किसी की मदद कर सकें, किसी के दुख को कम कर सकें, और यदि संभव न हो तो कम से कम सहारा बन सकें। अपने अहंकार और नाम की चाह से ऊपर उठकर आगे बढ़ें।
"साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाए, मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाए।"
जीवन को मजबूरी में नहीं, बल्कि पूरे उत्साह और जिंदादिली से जिएं, ताकि जब अंत का समय आए, तो मन में कोई बोझ न हो।
सनातन धर्म में मनुष्य के चार पुरुषार्थ बताए गए हैं—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इनमें अंतिम लक्ष्य मोक्ष है, अर्थात मुक्ति।
मुक्ति किससे? तनाव, चिंता और दुखों से। सच्चा आनंद तभी मिलता है जब मन इन बंधनों से मुक्त होता है।
मनुष्य की बुद्धि उसे अन्य जीवों से श्रेष्ठ बनाती है। यही बुद्धि उसे आत्मचिंतन और आत्मबोध की ओर ले जाती है।
जब हम स्वयं से पूछते हैं—"मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?"—तभी आत्मज्ञान की यात्रा शुरू होती है।
सबसे कठिन कार्य है—परमात्मा को जानने से पहले स्वयं को जानना।
हर व्यक्ति का मार्ग अलग हो सकता है, विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन अंतिम लक्ष्य एक ही है—आत्मज्ञान और परमात्मा की प्राप्ति।










