अंधे व्यक्ति ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि यदि उसे दृष्टि प्राप्त होती तो वह संसार का भला कर सकता था और दीन-दुखियों की सेवा में अपना जीवन लगा देता।
लंगड़े ने भी यही भाव व्यक्त किया कि यदि उसके पैर ठीक होते तो वह दौड़-दौड़कर अच्छे कार्य करता और समाज की भलाई में योगदान देता।
निर्धन व्यक्ति ने कहा कि यदि उसके पास धन होता तो वह गरीबों पर हो रहे अत्याचार का विरोध करता और अपनी संपत्ति परोपकार में लगा देता।
मूर्ख ने कहा कि यदि उसे विद्या प्राप्त होती तो वह ज्ञान का उपयोग केवल दूसरों की भलाई, सत्य की रक्षा और ज्ञान के विकास में करता, न कि स्वार्थ के लिए।
निर्बल व्यक्ति ने कहा कि यदि वह बलवान होता तो अत्याचारियों का विरोध करता और पीड़ितों की सहायता करता, तथा कभी भी दूसरों को कष्ट नहीं देता।
समय बीतने पर सभी को उनकी इच्छित क्षमताएँ प्राप्त हो जाती हैं। अंधे को दृष्टि, लंगड़े को चलने की शक्ति, निर्धन को धन, मूर्ख को विद्या और निर्बल को बल मिल जाता है।
परंतु परिस्थितियाँ बदलने के बाद उनके विचार भी बदल जाते हैं। दृष्टि प्राप्त व्यक्ति संसारिक सुखों में खो जाता है, लंगड़ा केवल अपने लाभ में लग जाता है, धनवान व्यक्ति स्वार्थी हो जाता है और अपने धन को बाँटना उचित नहीं समझता। विद्वान भी ज्ञान को निजी लाभ का साधन बना लेता है और बलवान शक्ति का उपयोग स्वार्थ में करने लगता है।
फिर समय का चक्र पलटता है और सभी अपनी-अपनी क्षमताएँ खो देते हैं, जिससे वे फिर पहले जैसी स्थिति में लौट आते हैं। उन्हें अपनी पुरानी प्रतिज्ञाएँ याद आती हैं, लेकिन तब तक अवसर हाथ से निकल चुका होता है।
यह कथा बताती है कि वर्तमान समय और साधनों का सही उपयोग करके ही समाज में भलाई संभव है, क्योंकि अवसर हमेशा स्थायी नहीं रहते।












