काठमांडू, 21 अप्रैल।
नेपाल की राजनीति में उस वक्त हड़कंप मच गया जब सत्तारूढ़ दल राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के अध्यक्ष और पूर्व गृहमंत्री रवि लामिछाने की संसद सदस्यता को चुनौती देते हुए सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया गया। अधिवक्ता आयुष बडाल द्वारा दायर इस रिट याचिका में मांग की गई है कि लामिछाने को सांसद के रूप में कार्य करने से तत्काल रोका जाए। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि चूंकि लामिछाने के विरुद्ध मनी लॉन्ड्रिंग (संपत्ति शुद्धिकरण) जैसे गंभीर प्रकृति के मामले विचाराधीन हैं, अतः सार्वजनिक पद की गरिमा और कानूनी प्रावधानों के तहत वे स्वतः निलंबन की श्रेणी में आते हैं।
कानूनी गलियारों में इस याचिका को लेकर चर्चाएं तेज हैं, हालांकि सर्वोच्च अदालत प्रशासन ने इसे अभी तक औपचारिक रूप से पंजीकृत नहीं किया है। प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, मामला सत्ता पक्ष के एक प्रभावशाली नेता और संवैधानिक पदों से जुड़ा होने के कारण इसे उच्च स्तरीय समीक्षा के लिए फिलहाल 'होल्ड' पर रखा गया है। नियमों के अनुसार, यदि अदालत किसी याचिका को पंजीकृत करने से इनकार करती है, तो उसे इसका लिखित कारण स्पष्ट करना होता है, लेकिन इस मामले में अब तक ऐसा कोई आदेश जारी नहीं हुआ है।
गौरतलब है कि पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान लामिछाने के खिलाफ संगठित अपराध और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में कुछ संशोधन किए गए थे, जिसे अदालत में चुनौती दी गई है। इस संवेदनशील मामले की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च अदालत की पूर्ण पीठ (फुल बेंच) में सुनवाई होनी है। अदालत ने इस प्रकरण पर गहन कानूनी विमर्श के लिए आगामी गुरुवार की तिथि निर्धारित की है, जिस पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं।
रवि लामिछाने की राजनीतिक यात्रा विवादों और कानूनी अड़चनों से भरी रही है। इससे पहले भी नागरिकता विवाद के कारण उन्हें अपनी सदस्यता और मंत्री पद गंवाना पड़ा था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सर्वोच्च अदालत इस नई याचिका को स्वीकार कर लेती है और गुरुवार की सुनवाई में कोई कड़ा रुख अपनाती है, तो यह न केवल लामिछाने के राजनीतिक भविष्य बल्कि वर्तमान सत्ता गठबंधन के स्थायित्व के लिए भी एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।










