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स्वास्थ्य व फिटनेस
24 Mar, 2026

विश्व क्षय रोग दिवस: टीबी के खिलाफ विज्ञान, समाज और सरकार का साझा संघर्ष

टीबी केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक असमानताओं से भी गहराई से जुड़ा रोग है। सरकार, विज्ञान और समाज मिलकर इसके प्रभावी नियंत्रण और उन्मूलन के लिए सतत प्रयास कर रहे हैं।

24 मार्च, नई दिल्ली

मानव इतिहास में कुछ बीमारियाँ केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करती हैं। ऐसा ही गंभीर रोग है क्षय रोग, जिसे आज ट्यूबरक्लोसिस (टीबी) कहा जाता है। प्राचीन भारत में इसे ‘राजयक्ष्मा’ कहा जाता था, जबकि यूरोप में इसे ‘सफेद महामारी’ के नाम से जाना गया। यह रोग साहित्य और कला पर भी असर डालता रहा है। 24 मार्च 1882 को रॉबर्ट कोच ने मायकोबैक्टीरियम क्षय की खोज की थी। इसी दिन को आज विश्व क्षय रोग दिवस के रूप में मनाया जाता है।

टीबी मुख्यतः खांसी, छींक और बातचीत के दौरान फैलने वाले बूँदकणों से संचारित होता है। यह फेफड़ों को प्रभावित करता है, लेकिन मस्तिष्क, हड्डियों, गुर्दे और लसीका ग्रंथियों तक भी फैल सकता है। रोग का सुप्त चरण भी चुनौतीपूर्ण होता है, जब लक्षण नहीं दिखते, लेकिन प्रतिरक्षा कमजोर होने पर यह सक्रिय हो जाता है।

टीबी केवल स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असमानता का प्रतीक भी है। विकसित देशों में इसे नियंत्रित किया जा चुका है, लेकिन दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका के कई हिस्सों में यह महामारी के रूप में मौजूद है। वैश्विक टीबी मामलों का लगभग 60 प्रतिशत भारत, चीन, इंडोनेशिया, नाइजीरिया, पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका में केंद्रित है।

भारत विश्व के कुल टीबी मामलों का लगभग 27 प्रतिशत संभालता है। राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम के तहत आधुनिक जांच तकनीकें लागू की गई हैं। मरीजों को पोषण और आर्थिक सहायता दी जाती है। ‘निक्षय मित्र’ पहल के माध्यम से समाज और कॉर्पोरेट क्षेत्र रोगियों की देखभाल करते हैं। दवा-प्रतिरोधी टीबी (एमडीआर/एक्सडीआर) के इलाज के लिए विशेष उपाय और नई दवाओं का प्रयोग किया जा रहा है। प्रधानमंत्री के “टीबी मुक्त भारत” अभियान में “100 दिन अभियान”, “टीबी मुक्त ऐप” और “टीबी मुक्त शहरी वार्ड पहल” शामिल हैं।

एमडीआर और एक्सडीआर-टीबी के कारण उपचार लंबा और कठिन है। सामान्य टीबी छह महीने में ठीक हो जाती है, जबकि एमडीआर-टीबी में 18–24 महीने लगते हैं। बच्चों, युवाओं, बुजुर्गों और एचआईवी संक्रमितों में इसका असर अलग होता है।

टीबी केवल बैक्टीरिया का रोग नहीं है, बल्कि गरीबी, कुपोषण, अस्वच्छता और सामाजिक कलंक से भी प्रभावित है। जीवन स्तर, पोषण, स्वच्छता और जागरूकता पर ध्यान देकर इसे नियंत्रित किया जा सकता है।

वैज्ञानिक शोध, नई दवाइयां और डिजिटल निगरानी उपचार को अधिक प्रभावी बना रही हैं। जब विज्ञान, सरकार और समाज एक साथ काम करेंगे, तभी टीबी जैसी महामारियों को इतिहास बनाया जा सकेगा और मानवता एक स्वस्थ भविष्य की ओर बढ़ेगी।

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