संपादकीय
09 May, 2026

भारत की मजबूती के लिए सामाजिक समरसता जरूरी: जातियों में बांटकर सदियों तक हमें कमजोर किया गया

भारत की एकता और मजबूती के लिए सामाजिक समरसता, जातिगत राजनीति में बदलाव, जनसंख्या नीति, समान नागरिक संहिता और धार्मिक सौहार्द जैसे विषयों पर विचार व्यक्त किए गए हैं।

09 मई।

भारत विविधताओं का देश है। यहां अनेक धर्म, भाषाएं, संस्कृतियां और जातियां सदियों से साथ-साथ रहती आई हैं। यही विविधता भारत की सबसे बड़ी शक्ति मानी जाती है, लेकिन जब यही विविधताएं राजनीतिक स्वार्थ का साधन बन जाती हैं तो समाज में विभाजन, तनाव और असमानता पैदा होती है। हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने सामाजिक समरसता, जाति आधारित राजनीति, जनसंख्या नियंत्रण नीति, समान नागरिक संहिता और धार्मिक सद्भाव जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए। उनके वक्तव्य केवल राजनीतिक टिप्पणी नहीं हैं, बल्कि भारतीय समाज की वर्तमान चुनौतियों और भविष्य की दिशा को समझने का प्रयास भी हैं।
डॉ. भागवत ने कहा कि नेता अक्सर जातियों का उपयोग वोट पाने के लिए करते हैं। यह बात भारतीय राजनीति की एक बड़ी सच्चाई को सामने लाती है। चुनावों में राजनीतिक दल अक्सर विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों की बजाय जातीय समीकरणों पर अधिक ध्यान देते हैं। उम्मीदवारों का चयन भी कई बार जातीय गणित को ध्यान में रखकर किया जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि समाज में जातीय पहचान और अधिक मजबूत हो जाती है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जाति आधारित राजनीति तभी समाप्त होगी जब समाज स्वयं जाति के आधार पर सोचना बंद करेगा। यह कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि राजनीति समाज का ही प्रतिबिंब होती है। यदि समाज जाति को प्राथमिकता देगा तो राजनीतिक दल भी उसी आधार पर रणनीति बनाएंगे। इसलिए परिवर्तन की शुरुआत समाज से ही करनी होगी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि व्यक्ति की पहचान उसकी जाति से नहीं बल्कि उसके गुण, शिक्षा, कर्म और मानवता से हो। जब समाज में समानता और भाईचारे की भावना मजबूत होगी तभी राजनीति भी सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ सकेगी। सामाजिक समरसता केवल नारों से स्थापित नहीं हो सकती, बल्कि इसे व्यवहार में अपनाना होगा। वास्तव में भारतीय समाज में समानता की बात तो बहुत की जाती है, लेकिन व्यवहार में अभी भी भेदभाव दिखाई देता है। कई क्षेत्रों में जाति के आधार पर ऊंच-नीच, छुआछूत और सामाजिक दूरी आज भी मौजूद है। समरसता का अर्थ केवल साथ रहने से नहीं है, बल्कि एक-दूसरे का सम्मान करने, समान अवसर देने और दुख-सुख में सहभागी बनने से है। यदि समाज के सभी वर्गों को समान अधिकार और सम्मान मिलेगा तभी वास्तविक सामाजिक एकता स्थापित होगी।
अपने संबोधन में डॉ. भागवत ने जनसंख्या नियंत्रण नीति पर भी विचार रखे। उन्होंने कहा कि कोई भी कानून लोगों के सहयोग और जागरूकता के बिना सफल नहीं हो सकता। उन्होंने आपातकाल के दौरान जबरन नसबंदी अभियान का उदाहरण देते हुए बताया कि जब लोगों पर दबाव डाला गया तो समाज में असंतोष बढ़ा और सरकार को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा। यह उदाहरण लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण सीख देता है कि किसी भी नीति को सफल बनाने के लिए जनता का विश्वास और सहभागिता आवश्यक है। जनसंख्या नियंत्रण केवल कानून बनाकर लागू नहीं किया जा सकता। इसके लिए महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, आर्थिक सशक्तिकरण और जागरूकता जैसे पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है।
डॉ. भागवत ने समान नागरिक संहिता पर भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में फैसले धीरे-धीरे लिए जाते हैं और यह प्रक्रिया राज्य दर राज्य आगे बढ़ रही है। समान नागरिक संहिता का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए समान कानून लागू करना है, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। समर्थकों का मानना है कि इससे लैंगिक समानता और राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी, जबकि विरोधियों को आशंका है कि इससे धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में किसी भी नीति को लागू करने से पहले व्यापक संवाद और सामाजिक सहमति आवश्यक है।
धार्मिक सद्भाव पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि सभी धर्म अंततः एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं। अलग-अलग धर्मों के रास्ते भले अलग हों, लेकिन मंजिल एक ही है। यह विचार भारतीय संस्कृति की उस परंपरा को दर्शाता है जिसमें “वसुधैव कुटुंबकम्” और “सर्व धर्म समभाव” की भावना रही है। भारत की ताकत उसकी धार्मिक विविधता और सहिष्णुता में निहित है, लेकिन जब धर्म को राजनीति का साधन बना दिया जाता है तब समाज में विभाजन और संघर्ष पैदा होते हैं।
डॉ. भागवत ने यह भी कहा कि भारत बार-बार इसलिए पराधीन हुआ क्योंकि समाज में विभाजन था। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब भारतीय समाज जाति, धर्म या क्षेत्र के आधार पर बंटा, तब बाहरी शक्तियों ने उसका लाभ उठाया। आज भी यदि समाज में आपसी अविश्वास और विभाजन बढ़ेगा तो राष्ट्रीय एकता कमजोर होगी। इसलिए देश के विकास और सामाजिक सद्भाव के लिए भाईचारा, सहयोग और भावनात्मक जुड़ाव अत्यंत आवश्यक है।
डॉ. मोहन भागवत के विचार भारतीय समाज के सामने मौजूद कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को उजागर करते हैं। जाति आधारित राजनीति, सामाजिक असमानता, धार्मिक विभाजन और जनसंख्या नीति जैसे विषय केवल राजनीतिक बहस के मुद्दे नहीं हैं, बल्कि देश के भविष्य से जुड़े प्रश्न हैं। यदि भारत को एक मजबूत, विकसित और समरस राष्ट्र बनाना है तो समाज को जाति और धर्म से ऊपर उठकर मानवता, समानता और भाईचारे की भावना को अपनाना होगा। कानून और नीतियां तभी सफल होंगी जब जनता उनका समर्थन करेगी और उन्हें अपने व्यवहार में उतारेगी। सच्चा विकास केवल आर्थिक प्रगति से नहीं बल्कि सामाजिक एकता, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रीय समरसता से संभव है।
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