सरकार व नीतियाँ
27 Apr, 2026

गांधीनगर में बायोगैस क्रांति: अपशिष्ट से बनी ऊर्जा आत्मनिर्भरता

गुजरात के एक शैक्षणिक संस्थान ने बायोगैस संयंत्र के जरिए एलपीजी पर निर्भरता खत्म कर अपशिष्ट से ऊर्जा आत्मनिर्भरता और जैविक खेती का सफल मॉडल स्थापित किया है।

नई दिल्ली, 27 अप्रैल

गुजरात के गांधीनगर स्थित मानेकबा विनय विहार शैक्षणिक परिसर ने अपशिष्ट प्रबंधन के माध्यम से ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। संस्थान ने एलपीजी पर पूरी निर्भरता समाप्त करते हुए बायोगैस आधारित रसोई व्यवस्था को अपनाया है, जिसके जरिए प्रतिदिन 500 से अधिक लोगों के लिए भोजन तैयार किया जा रहा है।

केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के अनुसार यहां दो बायोगैस संयंत्र संचालित किए जा रहे हैं, जिनकी संयुक्त क्षमता प्रतिदिन 90 घन मीटर है। इन संयंत्रों में गौशाला में मौजूद 222 गायों का गोबर, रसोई से निकलने वाला कचरा और आसपास के कृषि अवशेषों का उपयोग किया जाता है। इससे प्राप्त गैस से संस्थान की पूरी रसोई संचालित हो रही है और एलपीजी सिलेंडरों की आवश्यकता समाप्त हो गई है। अधिकारियों के अनुसार पहले यहां हर महीने लगभग 30 सिलेंडरों की जरूरत पड़ती थी।

बायोगैस उत्पादन की प्रक्रिया के बाद बचने वाला अवशेष अब जैविक खाद के रूप में खेतों में उपयोग किया जा रहा है, जिससे पूरी तरह प्राकृतिक खेती को बढ़ावा मिल रहा है। यह व्यवस्था न केवल ऊर्जा आत्मनिर्भरता को मजबूत कर रही है, बल्कि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने में भी सहायक सिद्ध हो रही है।

गुजरात ऊर्जा विकास एजेंसी द्वारा संस्थागत बायोगैस संयंत्रों के लिए 25 से 85 घन मीटर क्षमता तक वित्तीय सहायता दी जाती है। गैर-लाभकारी संस्थानों को इसमें 75 प्रतिशत तक अनुदान प्राप्त होता है। पिछले पांच वर्षों में राज्य में लगभग 193 ऐसे बायोगैस संयंत्र स्थापित किए जा चुके हैं, जिससे स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन, अपशिष्ट प्रबंधन और जैविक खेती को व्यापक स्तर पर प्रोत्साहन मिल रहा है।

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