मध्य-पूर्व
16 Apr, 2026

ईरान युद्ध में उजागर हुई ब्रिटेन की सैन्य कमजोरी, घटती क्षमता पर सवाल

ईरान संघर्ष के दौरान ब्रिटेन की घटती सैन्य क्षमता और सीमित संसाधनों का खुलासा हुआ है, जिसमें नौसेना, वायुसेना और थलसेना सभी स्तरों पर भारी गिरावट दर्ज की गई है।

नई दिल्ली, 16 अप्रैल

ईरान युद्ध के दौरान सामने आई परिस्थितियों ने ब्रिटेन की सशस्त्र सेनाओं की घटती क्षमता को उजागर कर दिया है, जिससे प्रधानमंत्री कीर स्टारमर पर रक्षा निवेश के वादों को पूरा करने का दबाव बढ़ गया है, जबकि सैन्य नेतृत्व वर्षों से लगातार संसाधनों की कमी को लेकर चेतावनी देता रहा है।

मामला तब और चर्चा में आया जब मार्च में संघर्ष के शुरुआती दौर में साइप्रस स्थित एक ब्रिटिश सैन्य अड्डे पर ड्रोन हमला हुआ, लेकिन ब्रिटेन की ओर से पूर्वी भूमध्य सागर में एक युद्धपोत भेजने में लगभग तीन सप्ताह लग गए, जबकि फ्रांस, ग्रीस और इटली ने कुछ ही दिनों में अपने जहाज तैनात कर दिए।

ब्रिटेन की घटती सैन्य ताकत को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी टिप्पणी हुई है, जहां अमेरिका के राष्ट्रपति ने ब्रिटेन के विमानवाहक पोतों को ‘खिलौना’ बताया, वहीं अमेरिकी रक्षा प्रमुख ने रॉयल नेवी पर कटाक्ष किया।

सरकार की ओर से बचाव करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि पिछले लगभग दो वर्षों में रक्षा बजट में शीत युद्ध के बाद सबसे बड़ी निरंतर वृद्धि की गई है।

वर्तमान में ब्रिटेन की सेना का आकार शीत युद्ध काल की तुलना में लगभग आधा रह गया है और थल सेना 19वीं सदी की शुरुआत के बाद सबसे छोटे स्तर पर पहुंच चुकी है।

रॉयल नेवी की स्थिति भी काफी बदल चुकी है, जहां अब लगभग 38 हजार कर्मी कार्यरत हैं और दो विमानवाहक पोतों के साथ 13 विध्वंसक और फ्रिगेट का संयुक्त बेड़ा मौजूद है। वर्ष 1991 की तुलना में यह संख्या काफी कम हो गई है, जब कर्मियों की संख्या लगभग 62 हजार थी और बेड़े में तीन विमानवाहक पोत तथा लगभग 50 युद्धपोत शामिल थे।

साइप्रस में युद्धपोत भेजने में हुई देरी को लेकर भी नौसेना की क्षमता पर सवाल उठे हैं, जबकि वर्तमान में कुछ आधुनिक युद्धपोतों और तकनीकी उन्नयन की प्रक्रिया जारी है।

दशकों में रक्षा बजट में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई है, जहां शीत युद्ध काल में सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 3.8 प्रतिशत रक्षा पर खर्च होता था, जो 2024 में घटकर लगभग 2.3 प्रतिशत रह गया।

ब्रिटेन ने लंबे समय तक मध्य पूर्व में युद्धपोत की उपस्थिति बनाए रखी थी, जो दिसंबर 2025 में एक पोत के सेवानिवृत्त होने के बाद समाप्त हो गई।

नौसेना के कई पुराने जहाज अब सेवा से हटाए जाने की स्थिति में हैं, जबकि नए फ्रिगेट आने वाले वर्षों में शामिल किए जाएंगे। साथ ही, रूसी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए ब्रिटिश युद्धपोतों की तैनाती उत्तरी अटलांटिक में भी की गई है।

परमाणु क्षमता के तहत देश अपने ट्राइडेंट प्रणाली के माध्यम से निरंतर समुद्री गश्त बनाए रखता है, जिसे आने वाले वर्षों में नए ड्रीडनॉट वर्ग के पनडुब्बियों से बदला जाएगा।

वायुसेना की स्थिति भी पहले की तुलना में काफी बदली है, जहां अब 150 से अधिक लड़ाकू विमान हैं, जबकि वर्ष 1991 में यह संख्या लगभग 700 थी।

ब्रिटेन ने हाल के तनाव के दौरान साइप्रस और कतर में कुछ लड़ाकू विमानों की तैनाती की, लेकिन वह सीधे संघर्ष में शामिल नहीं है और केवल रक्षात्मक मिशन चला रहा है।

थल सेना की स्थिति भी पहले की तुलना में कमजोर हुई है, जहां वर्तमान में लगभग 74 हजार सैनिक हैं, जबकि 1991 में यह संख्या 1.48 लाख थी। साथ ही, मुख्य युद्धक टैंकों की संख्या भी लगभग 1200 से घटकर करीब 150 रह गई है।

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