नई दिल्ली, 14 अप्रैल
राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी ने उर्वरकों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में एक व्यापक रूपरेखा तैयार करने के उद्देश्य से विचार-विमर्श सत्र आयोजित किया। इस चर्चा में विभिन्न सरकारी विभागों, शिक्षाविदों, उर्वरक उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों और किसानों के प्रतिनिधियों ने भाग लेते हुए इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की आवश्यकता पर एकमत राय व्यक्त की।
सत्र के उपरांत कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक और अकादमी के अध्यक्ष डॉ. एम.एल. जाट ने संवाददाताओं से चर्चा की। उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक आत्मनिर्भर राष्ट्र बनने के लक्ष्य में कृषि क्षेत्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। हरित क्रांति के समय उर्वरकों ने उत्पादन वृद्धि में अहम योगदान दिया, लेकिन वर्तमान समय में इनके असंतुलित और अत्यधिक उपयोग से नई चुनौतियां सामने आई हैं।
उन्होंने बताया कि देश में हर वर्ष लगभग 33 मिलियन टन उर्वरकों की खपत होती है, जिसमें बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर है। ऐसे में आयात पर निर्भरता कम करना जरूरी हो गया है। इसके लिए अल्पकालिक, मध्यकालिक और दीर्घकालिक रणनीतियों को शामिल करते हुए समग्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता बताई गई। मृदा स्वास्थ्य को सुदृढ़ करना, उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देना और किसानों में जागरूकता बढ़ाना इस दिशा में अहम कदम माने गए।
डॉ. जाट ने उर्वरकों के बेहतर उपयोग के लिए सटीक पोषक तत्व प्रबंधन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सेंसर आधारित तकनीकों के उपयोग पर बल दिया। साथ ही दालों और तिलहनों की ओर फसल विविधीकरण, जैविक कचरे के पुनर्चक्रण और जैविक स्रोतों के उपयोग को बढ़ाने से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की बात कही गई।
विचार-विमर्श के दौरान प्रतिभागियों ने बहुआयामी रणनीति अपनाने की सलाह दी, जिसमें अनुसंधान और विकास को मजबूती देने, वैकल्पिक उर्वरकों के विकास, स्वदेशी खनिजों और औद्योगिक उप-उत्पादों के उपयोग, जैविक पदार्थों को बढ़ावा देने और बेहतर कृषि पद्धतियों को अपनाने पर जोर दिया गया। इसके साथ ही मिट्टी के माइक्रोबायोम की क्षमता का उपयोग, खाद निर्माण तकनीकों में सुधार और पोषक तत्व उपयोग दक्षता बढ़ाने पर भी बल दिया गया।
इस दौरान एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए मिशन मोड कार्यक्रम शुरू करने की आवश्यकता पर सहमति बनी। प्रस्तावित योजना के तहत अगले तीन वर्षों में खनिज उर्वरकों के उपयोग का कम से कम 25 प्रतिशत हिस्सा जैविक खाद से प्रतिस्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से तकनीकों के व्यापक प्रसार की आवश्यकता भी जताई गई।
प्रतिनिधियों ने यह भी सुझाव दिया कि उर्वरक नीतियों में व्यापक बदलाव की जरूरत है। यूरिया को पोषक तत्व आधारित सब्सिडी में शामिल करने, सब्सिडी को मृदा स्वास्थ्य कार्ड से जोड़ने और प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण की संभावना पर विचार करने की बात कही गई। सस्ते यूरिया की उपलब्धता को इसके अत्यधिक उपयोग का प्रमुख कारण बताया गया, जबकि फास्फोरस और पोटैशियम जैसे महंगे उर्वरकों का कम उपयोग मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।
पृष्ठभूमि के रूप में बताया गया कि हरित क्रांति ने देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया, लेकिन आज भी उर्वरक क्षेत्र विशेषकर फास्फोरस और पोटेशियम के मामले में आयात पर निर्भर है। इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव और सब्सिडी का बोझ बढ़ता है। उर्वरकों के असंतुलित उपयोग से पोषक तत्वों का बड़ा हिस्सा व्यर्थ चला जाता है, जिससे लागत बढ़ती है और पर्यावरण पर भी असर पड़ता है।
आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में कुल उर्वरक खपत 32.93 मिलियन टन तक पहुंच गई, जिसमें नाइट्रोजन का अनुपात अत्यधिक अधिक है। यूरिया उत्पादन में प्रयुक्त प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा आयातित है, जो इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की आवश्यकता को और स्पष्ट करता है। विशेषज्ञों ने इसे केवल आपूर्ति संकट नहीं, बल्कि नीतिगत और अनुसंधान स्तर पर सुधार की चेतावनी के रूप में देखने की बात कही।
















