मोहन भागवत ने समाज में एकता को राष्ट्र की शक्ति बताया और कहा कि आंतरिक विभाजन ही ऐतिहासिक कमजोरियों का कारण रहा है, इसलिए संगठित समाज ही आत्मनिर्भर भारत की नींव है।
13 अप्रैल।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण बयान देते हुए भारतीय समाज को उसकी ऐतिहासिक कमजोरियों और संभावनाओं दोनों का आईना दिखाया। केशव बलिराम हेडगेवार के पैतृक गांव में दिए गए उनके संबोधन में एक स्पष्ट संदेश उभरकर सामने आया—“समाज की आंतरिक फूट ही बार-बार गुलामी का सबसे बड़ा कारण रही है।”
यह कथन केवल एक विचार नहीं, बल्कि इतिहास के पन्नों से निकला एक गहरा विश्लेषण है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना अतीत में था। भारत सदियों तक विदेशी शक्तियों के अधीन रहा। आम तौर पर इसका कारण बाहरी आक्रमणों को माना जाता है, लेकिन मोहन भागवत ने इस सोच को एक नया दृष्टिकोण दिया। उनके अनुसार, बाहरी ताकतें तभी सफल होती हैं, जब समाज भीतर से कमजोर और बंटा हुआ हो।
इतिहास गवाह है कि जब-जब भारतीय समाज में एकता कमजोर हुई, तब-तब विदेशी शक्तियों ने इसका लाभ उठाया। यही कारण है कि उन्होंने समाज के आत्ममंथन की आवश्यकता पर जोर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार केवल स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि दूरदर्शी चिंतक भी थे। उनका मानना था कि जब तक समाज संगठित और सशक्त नहीं होगा, तब तक स्वतंत्रता स्थायी नहीं रह सकती। इसी विचार के साथ उन्होंने 1925 में संघ की स्थापना की, जिसका मूल उद्देश्य समाज में एकता, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति की भावना विकसित करना था।
अपने भाषण में मोहन भागवत ने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदुत्व का अर्थ किसी एकरूपता को थोपना नहीं है, बल्कि यह विविधता में समरसता का दर्शन है। भारत जैसे बहु-सांस्कृतिक देश में अलग-अलग परंपराएं, भाषाएं और मान्यताएं स्वाभाविक हैं। ऐसे में एकता का अर्थ यह नहीं कि सभी एक जैसे बन जाएं, बल्कि यह है कि सभी अपनी पहचान के साथ एक साझा राष्ट्रीय भावना में बंधे रहें।
संघ की शाखाएं केवल व्यायाम या गतिविधियों का केंद्र नहीं हैं, बल्कि यह व्यक्तित्व निर्माण की प्रयोगशाला हैं। यहां स्वयंसेवकों को अनुशासन, सेवा और समर्पण के मूल्य सिखाए जाते हैं। मोहन भागवत के अनुसार, शाखा में विकसित होने वाले संस्कार व्यक्ति को एक जिम्मेदार नागरिक बनाते हैं, जो समाज और राष्ट्र दोनों के प्रति समर्पित रहता है।
“किसी के खिलाफ नहीं, राष्ट्र के पक्ष में”—संघ को लेकर अक्सर कई तरह की धारणाएं बनाई जाती हैं, लेकिन मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ की स्थापना किसी के विरोध में नहीं हुई थी। इसका उद्देश्य केवल एक ही था—मातृभूमि को सशक्त बनाना और समाज को एकजुट करना। यह संदेश आज के समय में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जब समाज कई स्तरों पर विभाजनों का सामना कर रहा है।
आज का भारत तेजी से बदल रहा है, लेकिन सामाजिक चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। जाति, भाषा, क्षेत्र और विचारधारा के आधार पर विभाजन अब भी देखने को मिलता है। ऐसे समय में मोहन भागवत का यह संदेश हमें याद दिलाता है कि अगर समाज एकजुट होगा, तो कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होगी, लेकिन अगर हम आपस में बंटे रहेंगे, तो प्रगति की राह मुश्किल हो जाएगी।
इतिहास से सीखते हुए, केशव बलिराम हेडगेवार का दृष्टिकोण और मोहन भागवत के विचार हमें यह सिखाते हैं कि राष्ट्र की मजबूती केवल सीमाओं की सुरक्षा से नहीं, बल्कि समाज की एकता से तय होती है। आज जरूरत है कि हम अपने मतभेदों को पीछे छोड़कर एक साझा लक्ष्य की ओर बढ़ें। विविधता को सम्मान देते हुए एकता को मजबूत करना ही भारत को सशक्त और आत्मनिर्भर बना सकता है। एकजुट समाज ही सशक्त राष्ट्र की पहचान होता है और यही इस विचार का सार है।