संपादकीय
14 Apr, 2026

बिना पानी-बिजली के आंगनवाड़ी में आरओ-टीवी: क्या ‘विकास’ अब सिर्फ कागज़ों पर

आंगनवाड़ी केंद्रों में आरओ और टीवी स्थापना को लेकर उठे सवालों ने विकास की प्राथमिकताओं और जमीनी जरूरतों की अनदेखी पर गंभीर बहस छेड़ दी है।

13 अप्रैल।
मध्य प्रदेश में विकास की परिभाषा आखिर तय कौन कर रहा है—ज़मीनी हकीकत या फाइलों में दर्ज आंकड़े? हाल ही में सामने आया आंगनवाड़ी केंद्रों में आरओ और टीवी लगाने का मामला इसी सवाल को और तीखा बना देता है। यह निर्णय न केवल प्रशासनिक संवेदनहीनता को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि प्राथमिकताओं का संतुलन किस कदर बिगड़ चुका है।
प्रदेश की हजारों आंगनवाड़ियाँ आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही हैं। कहीं पीने के लिए साफ पानी उपलब्ध नहीं है, तो कहीं बिजली का कनेक्शन तक नहीं। कई केंद्र ऐसे हैं, जहाँ न पानी की टंकी है, न हैंडपंप और न ही बच्चों के बैठने की समुचित व्यवस्था। ऐसे में इन केंद्रों में आरओ और टीवी जैसे उपकरणों की स्थापना न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि यह सरकारी योजनाओं की दिशा और दृष्टि पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी लगाती है।
विकास का अर्थ केवल उपकरणों की खरीद नहीं होता, बल्कि उन उपकरणों के उपयोग के लिए आवश्यक आधारभूत ढांचा तैयार करना भी उतना ही जरूरी होता है। यदि बिजली ही नहीं है, तो टीवी किसके लिए और कैसे चलेगा? यदि पानी की उपलब्धता ही नहीं है, तो आरओ मशीन का अस्तित्व किस काम का? यह स्थिति किसी भी आम नागरिक को यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्या यह सब केवल बजट खपाने और उपलब्धि दिखाने का खेल तो नहीं। यह मामला केवल एक प्रशासनिक भूल नहीं, बल्कि व्यवस्था की सोच पर सवाल है।
योजनाएं बनाते समय क्या वास्तव में जमीनी जरूरतों का आकलन किया जाता है, या फिर निर्णय केवल कागजी आंकड़ों और ऊपरी निर्देशों के आधार पर लिए जाते हैं? यदि ऐसा ही चलता रहा, तो विकास की असल तस्वीर कभी सामने नहीं आ पाएगी।
यह भी गौर करने वाली बात है कि आंगनवाड़ी केंद्र समाज के सबसे संवेदनशील वर्ग—बच्चों और महिलाओं—से जुड़े होते हैं। यहां पोषण, स्वास्थ्य और प्रारंभिक शिक्षा जैसी बुनियादी सेवाएं दी जाती हैं। ऐसे में इन केंद्रों की उपेक्षा किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं हो सकती। जब एक तरफ कुपोषण और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं, तब इस तरह के फैसले स्थिति को और जटिल बना देते हैं।
सरकार ने कई मौकों पर यह संकेत दिया है कि शिक्षा और महिला-बाल विकास जैसे विभाग उसकी प्राथमिकता में हैं। उम्मीद भी की जा रही थी कि व्यवस्थाओं में सुधार होगा और भ्रष्टाचार या अनियमितताओं पर अंकुश लगेगा। लेकिन इस तरह के मामले यह दर्शाते हैं कि निचले स्तर पर न तो जवाबदेही तय हो पा रही है और न ही योजनाओं के क्रियान्वयन की सही निगरानी हो रही है।
अब सवाल यह है कि क्या इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी? क्या उन अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाएगी, जिन्होंने इस तरह के निर्णयों को अमल में लाया? या फिर यह मामला भी समय के साथ अन्य फाइलों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा? यदि जवाबदेही तय नहीं होती, तो इस तरह की विसंगतियां भविष्य में भी दोहराई जाती रहेंगी।
विकास के नाम पर दिखावे की प्रवृत्ति को अब समाप्त करना होगा। प्राथमिकताओं को सही क्रम में तय करना ही सुशासन की पहली शर्त है—पहले पानी, बिजली और बुनियादी ढांचा, फिर तकनीकी सुविधाएं। यही व्यावहारिक और जिम्मेदार दृष्टिकोण हो सकता है।
प्रदेश के नीति-निर्माताओं को यह समझना होगा कि जनता अब केवल घोषणाओं और कागजी उपलब्धियों से संतुष्ट नहीं है। वह जमीन पर बदलाव देखना चाहती है। आंगनवाड़ी जैसे संस्थानों में यदि बुनियादी सुविधाएं ही सुनिश्चित नहीं हो पातीं, तो यह पूरे विकास मॉडल पर सवाल खड़ा करता है। समय की मांग है कि इस मुद्दे को गंभीरता से लिया जाए, दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो और भविष्य में इस तरह की योजनाओं के क्रियान्वयन से पहले जमीनी वास्तविकताओं का सही आकलन सुनिश्चित किया जाए। वरना ‘विकास’ का यह मॉडल केवल आंकड़ों और विज्ञापनों तक ही सीमित रह जाएगा और असल जरूरतें हमेशा की तरह उपेक्षित ही रह जाएंगी।
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