सिजेरियन प्रसव के बढ़ते मामलों से स्वास्थ्य व्यवस्था और मातृत्व देखभाल पर सवाल उठ रहे हैं। सामान्य डिलीवरी कम होने के पीछे डॉक्टरों की सलाह, बदलती सोच और अस्पताल की सुविधाओं जैसे कारण बताए जा रहे हैं, जिससे सुरक्षित प्रसव को लेकर चिंता बढ़ रही है।
13 अप्रैल।
सुरक्षित मातृत्व को लेकर देशभर में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन इसी बीच सिजेरियन (ऑपरेशन से प्रसव) के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है। मध्य प्रदेश में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक नजर आ रही है, जहां कई शहरों में सिजेरियन प्रसव की दर निर्धारित मानकों से कहीं अधिक पहुंच चुकी है। शहरों में तेजी से बढ़ी सिजेरियन दर प्रदेश के प्रमुख शहरों के आंकड़े इस प्रवृत्ति को स्पष्ट करते हैं। ग्वालियर में जहां सिजेरियन की दर लगभग 7 प्रतिशत है, वहीं राजधानी भोपाल में यह 40 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इंदौर में स्थिति और गंभीर है, जहां यह आंकड़ा 70 प्रतिशत तक बताया जा रहा है। सरकारी अस्पतालों में औसतन 34 प्रतिशत और निजी अस्पतालों में करीब 60 प्रतिशत प्रसव सिजेरियन से हो रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यह दर विश्व स्तर पर स्वीकार्य मानकों से कहीं अधिक है। चिकित्सा मानकों के मुताबिक सिजेरियन की आदर्श दर 10 से 15 प्रतिशत के बीच होनी चाहिए।
निजी अस्पतालों पर उठ रहे सवाल
सिजेरियन प्रसव में वृद्धि के पीछे निजी अस्पतालों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। सामान्य प्रसव की तुलना में सिजेरियन में अधिक खर्च आता है, जिससे अस्पतालों को आर्थिक लाभ होता है। ऐसे में कई मामलों में बिना ठोस चिकित्सीय कारण के भी ऑपरेशन की सलाह दिए जाने की आशंका जताई जा रही है। सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी दूसरी ओर, सरकारी अस्पतालों की स्थिति भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि कई अस्पतालों में प्रशिक्षित स्टाफ, आधुनिक उपकरण और आवश्यक सुविधाओं की कमी है। सोनोग्राफी मशीनों का अभाव या खराब स्थिति में होना, डॉक्टरों की कमी और बढ़ता दबाव भी सामान्य प्रसव को प्रभावित कर रहा है। रेफरल प्रणाली भी एक बड़ा कारण बन रही है, जहां जटिलता की आशंका बताकर मरीजों को निजी अस्पतालों में भेजा जा रहा है।
महिलाओं की बदलती सोच भी कारण
विशेषज्ञ मानते हैं कि बदलती जीवनशैली और मानसिकता भी इस प्रवृत्ति के पीछे एक बड़ा कारण है। प्रसव पीड़ा से बचने की इच्छा, निर्धारित समय पर डिलीवरी की सुविधा और त्वरित समाधान की चाहत के चलते कई महिलाएं सिजेरियन को प्राथमिकता दे रही हैं। हालांकि, चिकित्सक स्पष्ट करते हैं कि सिजेरियन एक बड़ी सर्जरी है, जिसे केवल चिकित्सीय आवश्यकता होने पर ही अपनाया जाना चाहिए।
मां और शिशु दोनों के लिए जोखिम
चिकित्सकों के अनुसार, सिजेरियन प्रसव के अपने जोखिम हैं। मां के लिए संक्रमण, अधिक रक्तस्राव और लंबे समय तक रिकवरी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। वहीं, सिजेरियन से जन्मे बच्चों में एलर्जी, मोटापा और रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने का खतरा अधिक रहता है। इसके विपरीत, सामान्य प्रसव से जन्मे बच्चों का स्वास्थ्य अपेक्षाकृत बेहतर माना जाता है।
समाधान के लिए जरूरी ठोस कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बढ़ती प्रवृत्ति पर नियंत्रण के लिए बहुस्तरीय प्रयास जरूरी हैं। जागरूकता बढ़ाने, सरकारी अस्पतालों को संसाधन उपलब्ध कराने, निजी अस्पतालों की निगरानी सख्त करने और महिलाओं को सही परामर्श देने की आवश्यकता है। सुरक्षित मातृत्व केवल प्रसव तक सीमित नहीं है, बल्कि मां और शिशु के दीर्घकालिक स्वास्थ्य से जुड़ा है। ऐसे में सिजेरियन प्रसव के बढ़ते मामलों पर समय रहते नियंत्रण करना आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियों का स्वास्थ्य सुरक्षित रह सके।