संपादकीय
11 Apr, 2026

एक देश, एक कानून: यूसीसी पर निर्णायक समय

समान नागरिक संहिता को लेकर देश में जारी राजनीतिक और सामाजिक बहस के बीच न्यायपालिका की भूमिका, संसद की जिम्मेदारी और सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए एक देश एक कानून की दिशा में बढ़ती चर्चाओं को रेखांकित किया गया है।

11 अप्रैल।

सुप्रीम कोर्ट पर सभी धर्म और संप्रदाय का भरोसा है। राजनीतिक दल और सरकारें भी ऐसा ही दावा करती हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर संसद कानून भी बनाती है और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को संसद बदल भी देती है।

धर्म, जाति, संप्रदाय, पक्ष-विपक्ष से ऊपर कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट की बात जब सुनी जाती है, तब कानून बनता है, समाज भी बदलता है, रीतियां-कुरीतियां भी टूटती हैं। किसी देश की नागरिक संहिता लोगों का मौलिक अधिकार है। इसमें भेदभाव नहीं किया जा सकता। दुहाई तो सभी सुप्रीम कोर्ट की देते हैं, लेकिन उसकी हर बात को मानते नहीं हैं।

देश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर राजनीतिक विवाद सर्वविदित हैं। देश में यूसीसी लाना बीजेपी का एजेंडा है, तो मुस्लिम समाज इस पर अलग राय रखता है। इस पर वोट बैंक की खाता-बही भी चलती है। सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका में शरियत कानून 1937 की कुछ धाराओं को रद्द करने की मांग की गई। याचिका में कहा गया कि इन धाराओं से मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव होता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस पर फैसला करना विधायिका, यानी संसद का काम है। शरिया कानून की धारा रद्द कर दी गई, तो मुस्लिम समुदाय में संपत्ति के बंटवारे को लेकर कोई स्पष्ट कानून नहीं बचेगा। इससे कानूनी खालीपन पैदा हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट कई बार पहले ही कह चुका है कि देश में यूसीसी लाना जरूरी है। अब एक बार फिर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यही संकेत दिया है।

बीजेपी यूसीसी लागू करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता चुनावी घोषणापत्रों में दोहराती रही है। राज्य स्तर पर उत्तराखंड सरकार ने राज्य में समान नागरिक संहिता लागू कर दी है। अन्य राज्य सरकारें भी इस दिशा में प्रयासरत हैं।

मुस्लिम समाज की जनसंख्या देश में सरकार बनाने और बिगाड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मुस्लिम वोट बैंक के रूप में कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के खाते में ही माने जाते हैं। मुस्लिम समाज में प्रगतिशील वर्ग बढ़ रहा है। अरब देशों में कई सुधार और बदलाव हो रहे हैं।

इसके विपरीत धार्मिक कट्टरता भी कुछ देशों में देखी जा सकती है। ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच तनाव के पीछे जो भी सामरिक और आर्थिक कारण हों, लेकिन एक कारण इस्लामिक कट्टरता भी माना जाता है। भारत के संदर्भ में भले ही कट्टरता की गंभीरता थोड़ी कम हो, लेकिन इसके संकेत दिखाई देते हैं। आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता, लेकिन जब आतंकवादी घटनाएं एक ही मजहब से जुड़ती हैं, तो इस बात को नजरअंदाज करना कठिन हो जाता है। कश्मीर में आतंकवादी घटनाएं, कश्मीरी पंडितों का पलायन और धारा 370 के बाद आए बदलाव से यह भरोसा मजबूत होता है कि सुधार की ईमानदार कोशिश और हिम्मत दिखाई जाए, तो लोगों का साथ मिलता है।

वक्फ कानून के नियमों में संशोधन पर मुस्लिम समाज के साथ ही वोट बैंक की राजनीति करने वालों ने जितना विरोध किया था, वह धीरे-धीरे कमजोर पड़ा, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उस कानून को असंवैधानिक घोषित नहीं किया। वक्त के साथ सुधार अस्तित्व की पुकार है। बीजेपी सरकार द्वारा तीन तलाक समाप्त करने को लेकर कानून बनाया गया, तब भी धार्मिक कट्टरता के कारण विरोध हुआ, लेकिन इसके बाद मुस्लिम महिलाओं को जो ताकत मिली है, उसी का परिणाम है कि अब यूसीसी को लेकर भी सर्वोच्च अदालत में याचिकाएं दायर हो रही हैं।

राष्ट्र में समानता मौलिक आधार है। ऐसे में भेदभाव समाप्त करने वाले मुद्दों पर राजनीति या धार्मिक विवाद खड़े करना कालांतर में समाज को नुकसान ही पहुंचाता है। धार्मिक कट्टरता यदि समाज की आधी आबादी, यानी महिलाओं के हितों को प्रभावित कर रही है और उनके अधिकारों का हनन कर रही है, तो कानूनी प्रक्रिया चुपचाप नहीं बैठ सकती।

यह मानना भी उचित नहीं लगता कि भाजपा सरकार मुस्लिम महिलाओं के हित में समाज की मान्यताओं पर चोट कर रही है। यदि ऐसा माना भी जाए, तब भी आधी आबादी के साथ समानता और न्याय से पीछे नहीं हट सकता।

सुधार की हर प्रक्रिया का विरोध नकारात्मक मानसिकता को दर्शाता है। इस नकारात्मकता के लिए मुस्लिम समाज से अधिक राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं। एसआईआर का विरोध, एनआरसी का विरोध, यूसीसी का विरोध, सीएए का विरोध, वक्फ कानून का विरोध—तो फिर कोई भी सुधार कैसे होगा? घुसपैठियों को देश से बाहर करने का विरोध राष्ट्रीय हित में नहीं हो सकता, इससे राजनीतिक हित भले साधे जा सकते हों।

बीजेपी का ट्रैक रिकॉर्ड गवाह है कि राजनीतिक विरोध के बाद भी सुधार के लिए कदम बढ़ाने से वह हिचकती नहीं है। धारा 370 हटाई गई, अदालत के निर्णय पर राम मंदिर बना, एनआरसी आया, सीएए लागू हुआ, वक्फ कानून में बदलाव हुआ। अब यूसीसी लागू करने की दिशा में बीजेपी सरकार आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। राज्यों में इसे प्रभावी रूप से लागू करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर संसद में कानून बनाना अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन के लिए भी आवश्यक हो गया है।

नेशनल इश्यूज पर पर्सनल व्यूज मायने नहीं रखते हैं। सुप्रीम कोर्ट को न तो पर्सनल लॉ बोर्ड इनकार कर सकता है और न ही सरकार। धार्मिक मान्यताओं के आधार पर दो समुदायों के लिए अलग-अलग कानून और नियम राष्ट्रीय भावना को कमजोर करते हैं। लोकसभा और विधानसभा में नारी शक्ति को आरक्षण देने का कानून भी बीजेपी सरकार ने बनाया है। इससे हिंदू और मुस्लिम दोनों महिलाओं को लाभ मिलेगा। अब यूसीसी के मामले में बीजेपी सरकार को अपने कमिटमेंट और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन के लिए तत्परता से आगे आना होगा।

हर मामले में राजनीतिक विरोध हुआ है, इस पर भी होगा, लेकिन समाज सुधारकों को अपने दौर में विरोध ही झेलना पड़ा है। बाद में ही उनकी पहल को स्वीकार किया जाता है और सराहा जाता है।

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