नेपाल
11 Apr, 2026

बिना संबोधन समाप्त हुआ नेपाल संसद का पहला अधिवेशन, प्रधानमंत्री शाह रहे मौन

नेपाल में आम चुनाव के बाद गठित संसद के पहले अधिवेशन में प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के भाषण न देने और पूरे सत्र के दौरान मौन रहने से अधिवेशन बिना संबोधन के ही समाप्त हो गया।

काठमांडू, 11 अप्रैल 2026।

नेपाल में आम चुनाव के बाद गठित संसद के पहले अधिवेशन का समापन इस बार एक अलग ही राजनीतिक स्थिति में हुआ, जहां प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने पूरे सत्र के दौरान कोई भी संबोधन नहीं दिया और अधिवेशन बिना उनके भाषण के ही समाप्त हो गया।

जेनजी आंदोलन के समर्थन से हुए प्रतिनिधि सभा चुनाव के बाद बनी लगभग दो-तिहाई बहुमत वाली सरकार को लेकर यह उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री शाह संसद के पहले अधिवेशन में सरकार की दिशा और प्राथमिकताओं को स्पष्ट करेंगे। इसी कारण उनके संबोधन को लेकर राजनीतिक और जनस्तर पर विशेष उत्सुकता बनी हुई थी।

परंपरागत रूप से चुनाव के बाद गठित सरकार का प्रमुख संसद को संबोधित करते हुए नीतियों, मूल्यों और प्राथमिक एजेंडा की जानकारी देता रहा है, हालांकि यह संवैधानिक रूप से अनिवार्य नहीं माना जाता। इसके बावजूद यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है।

इस बार नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने संसद के पहले अधिवेशन के दौरान अपने ही निर्वाचित सांसदों के सामने सरकार की नीतिगत रूपरेखा और मूल्यों को प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं समझा, जिससे अधिवेशन के अंत तक उनका मौन बना रहा।

27 मार्च को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद उन्होंने 100 दिनों में लागू किए जाने वाले प्रशासनिक सुधारों की 100 बिंदुओं वाली कार्यसूची को मंजूरी देकर सार्वजनिक कर दिया था। इस कार्यसूची में नए कानूनों के निर्माण और पुराने कानूनों में संशोधन जैसे कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव शामिल हैं, जिनके लिए संसद का सहयोग आवश्यक है।

इसके बावजूद यह कार्यसूची न तो संसद में प्रस्तुत की गई और न ही इसे औपचारिक रूप से सदन के संज्ञान में लाया गया। ऐसे में सांसदों को भी सरकार की 100-दिवसीय योजना और प्राथमिकताओं की जानकारी मुख्य रूप से मीडिया रिपोर्टों के माध्यम से ही प्राप्त हुई।

संसदीय प्रक्रिया के जानकारों ने प्रधानमंत्री के इस रवैये को असामान्य बताया है। संघीय संसद सचिवालय के पूर्व महासचिव के अनुसार, आम चुनाव के बाद पहले अधिवेशन में प्रधानमंत्री का संबोधन एक स्थापित परंपरा रही है, और इस परंपरा के विपरीत पूरे अधिवेशन में प्रधानमंत्री का मौन रहना आश्चर्यजनक माना जा रहा है।

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