संपादकीय
13 Apr, 2026

“सुर कभी मरते नहीं, वे हमेशा गूंजते रहते हैं।”

स्वर साम्राज्ञी आशा भोसले के निधन से भारतीय संगीत जगत में शोक की लहर दौड़ गई। उनके योगदान ने संगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया, जिनके जाने से एक युग का अंत हुआ है।

13 अप्रैल।

संगीत की एक पाठशाला का अंत, स्वर साम्राज्ञी आशा भोसले को श्रद्धांजलि
भारतीय संगीत जगत के लिए 12 अप्रैल का दिन एक गहरे शोक का दिन बन गया, जब महान पार्श्व गायिका आशा भोसले ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके निधन के साथ ही संगीत का एक ऐसा युग समाप्त हो गया, जिसने दशकों तक न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में अपनी मधुरता और विविधता से श्रोताओं के दिलों पर राज किया।
मुंबई के ब्रिच कैंडी अस्पताल में अंतिम सांस लेने वाली आशा भोसले सिर्फ एक गायिका नहीं थीं, बल्कि वे संगीत की एक जीवित पाठशाला थीं। उनका जीवन, उनका संघर्ष, उनकी मेहनत और उनकी कला—सब मिलकर एक ऐसी विरासत बनाते हैं, जिसे शब्दों में समेटना कठिन है। बचपन से शुरू हुआ संगीत का सफर आशा भोसले ने मात्र 10 वर्ष की उम्र में संगीत की दुनिया में कदम रखा। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक थे, जिनसे उन्हें संगीत की प्रारंभिक शिक्षा मिली। बचपन में ही पारिवारिक जिम्मेदारियों ने उन्हें जल्दी परिपक्व बना दिया और उन्होंने फिल्मों में गाना शुरू किया। उनका शुरुआती दौर आसान नहीं था। उन्हें कई बार अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर की तुलना का सामना करना पड़ा, जो पहले से ही संगीत की दुनिया में स्थापित थीं। लेकिन आशा भोसले ने अपनी अलग पहचान बनाई—अपने अनोखे अंदाज, बहुमुखी प्रतिभा और प्रयोगधर्मी शैली के जरिए।
आशा भोसले की सबसे बड़ी खासियत उनकी बहुमुखी प्रतिभा थी। उन्होंने हर तरह के गीत गाए—ग़ज़ल, भजन, पॉप, कैबरे, लोकगीत और फिल्मी गीत। चाहे ओ. पी. नैयर के साथ उनके जोशीले गाने हों या आर. डी. बर्मन के साथ उनके आधुनिक और प्रयोगधर्मी गीत, हर शैली में उन्होंने अपनी छाप छोड़ी। उनकी आवाज में ऐसी लचक और भावनात्मक गहराई थी कि वे हर गीत को जीवंत बना देती थीं। “पिया तू अब तो आजा”, “दम मारो दम”, “इन आंखों की मस्ती” जैसे गाने आज भी श्रोताओं के दिलों में बसे हुए हैं।
आशा भोसले ने अपने करियर में हजारों गाने गाए। यही कारण है कि उनका नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में सबसे ज्यादा गाने रिकॉर्ड करने वाली कलाकार के रूप में दर्ज है। उनके गीत सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं थे, बल्कि वे समय के साथ बदलते समाज, भावनाओं और संस्कृति का आईना भी थे। उनकी आवाज ने हर पीढ़ी को जोड़ा, चाहे वह पुराने दौर के श्रोता हों या नए जमाने के युवा।
उनकी अद्भुत कला को कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें पद्म विभूषण और दादासाहेब फाल्के पुरस्कार जैसे देश के सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा गया। ये पुरस्कार सिर्फ उनकी उपलब्धियों का प्रमाण नहीं हैं, बल्कि यह दर्शाते हैं कि उन्होंने भारतीय संगीत को किस ऊंचाई तक पहुंचाया।
भारतीय संगीत में लता मंगेशकर और आशा भोसले का नाम हमेशा साथ लिया जाएगा। जहां लता मंगेशकर ने शास्त्रीयता और मधुरता की पराकाष्ठा को छुआ, वहीं आशा भोसले ने आधुनिकता और प्रयोगशीलता को नई दिशा दी। इन दोनों बहनों ने मिलकर भारतीय संगीत को एक ऐसा स्वरूप दिया, जो आज भी प्रेरणा का स्रोत है। यह कहना गलत नहीं होगा कि इन दोनों ने मिलकर एक स्वर्णिम युग की रचना की, जो अब इतिहास का हिस्सा बन चुका है।
आशा भोसले के निधन से फिल्म इंडस्ट्री में शोक की लहर दौड़ गई है। कलाकारों, संगीतकारों और उनके प्रशंसकों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। उनके साथ काम करने वाले कई दिग्गज कलाकारों ने उन्हें याद करते हुए कहा कि वे सिर्फ एक गायिका नहीं थीं, बल्कि एक प्रेरणा थीं—एक ऐसी कलाकार, जिसने हर किसी को बेहतर करने के लिए प्रेरित किया।
आशा भोसले का जीवन अपने आप में एक पाठशाला था। उन्होंने सिखाया कि संघर्ष चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, मेहनत और लगन से सफलता हासिल की जा सकती है। उनकी गायकी में जो विविधता थी, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सीख है कि कला में सीमाएं नहीं होतीं। हर कलाकार को खुद को लगातार विकसित करना चाहिए और नए प्रयोग करने चाहिए।
आशा भोसले का जाना सिर्फ एक महान गायिका का निधन नहीं है, बल्कि एक युग का अंत है। उनकी आवाज, उनके गीत और उनकी विरासत हमेशा जीवित रहेगी। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके गीत हर दिल में गूंजते रहेंगे। वे हमेशा संगीत प्रेमियों के दिलों में जीवित रहेंगी—एक ऐसी स्वर साम्राज्ञी के रूप में, जिसने अपने सुरों से दुनिया को एक नई पहचान दी। उनकी याद में यही कहा जा सकता है—“सुर कभी मरते नहीं, वे हमेशा गूंजते रहते हैं।”
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