संपादकीय
13 Apr, 2026

डॉलर पर दबाव, पर वर्चस्व कायम: बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था की नई दिशा

वैश्विक अर्थव्यवस्था में डॉलर के वर्चस्व को लेकर डी-डॉलराइजेशन और बदलते व्यापारिक समीकरणों के बीच नई बहुध्रुवीय वित्तीय व्यवस्था की ओर रुझान देखा जा रहा है।

13 अप्रैल।

वर्ष 2026 में वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का केंद्र एक बार फिर पश्चिम एशिया, विशेषकर होर्मुज़ जलडमरूमध्य बन गया है। ईरान की सैन्य गतिविधियों और अमेरिका के साथ उसके तनाव ने न केवल भू-राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित किया है, बल्कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर भी नए सवाल खड़े कर दिए हैं। हाल ही में ईरान द्वारा जहाजों के आवागमन के लिए डॉलर के बजाय युआन या क्रिप्टोकरेंसी में भुगतान की पेशकश ने “डॉलर के अंत” की बहस को फिर से हवा दे दी है।
लेकिन यह बहस नई नहीं है। पिछले कई दशकों से समय-समय पर डॉलर के कमजोर पड़ने या उसके विकल्प उभरने की चर्चा होती रही है। इसके बावजूद, अमेरिकी डॉलर अब भी वैश्विक वित्तीय प्रणाली का केंद्र बना हुआ है। इसका कारण केवल आर्थिक नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक और रणनीतिक संबंधों में भी निहित है।
डॉलर के वैश्विक वर्चस्व की नींव 1970 के दशक में पड़ी, जब अमेरिका और सऊदी अरब के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ। इस समझौते के तहत तेल की कीमतें डॉलर में तय की गईं और बदले में अमेरिका ने सऊदी अरब को सुरक्षा की गारंटी दी। इस व्यवस्था ने “पेट्रोडॉलर” प्रणाली को जन्म दिया, जिसने डॉलर को अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भंडार मुद्रा के रूप में मजबूत आधार प्रदान किया।
हालांकि, अब यह व्यवस्था धीरे-धीरे चुनौती का सामना कर रही है। चीन, जो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है, अब अपने कई व्यापारिक लेन-देन युआन में कर रहा है। रूस और भारत भी अपने द्विपक्षीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का उपयोग बढ़ा रहे हैं। इससे डॉलर पर निर्भरता कम करने की प्रवृत्ति—जिसे “डी-डॉलराइजेशन” कहा जाता है—तेजी से बढ़ रही है।
इस बदलाव का एक स्पष्ट संकेत केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार में भी दिखाई देता है। जहां वर्ष 2001 में वैश्विक भंडार का लगभग 72 प्रतिशत हिस्सा डॉलर में था, वहीं अब यह घटकर करीब 56 प्रतिशत रह गया है। इसके साथ ही, कई देश सोने की खरीद बढ़ा रहे हैं और अपने भंडार को विविध बना रहे हैं। भारत और चीन जैसे देश इस दिशा में विशेष रूप से सक्रिय हैं।
डी-डॉलराइजेशन की यह प्रवृत्ति केवल आर्थिक कारणों से नहीं, बल्कि राजनीतिक जोखिमों के कारण भी बढ़ रही है। रूस के विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज किए जाने जैसी घटनाओं ने कई देशों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम भरी हो सकती है। यही कारण है कि कई देश अब वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों और मुद्राओं की तलाश में हैं।
फिर भी, यह कहना जल्दबाजी होगी कि डॉलर का वर्चस्व समाप्त हो रहा है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती, उसकी सैन्य शक्ति और वैश्विक वित्तीय बाजारों की गहराई अब भी डॉलर को एक सुरक्षित और विश्वसनीय विकल्प बनाती है। यूरो, युआन या अन्य मुद्राएं अभी उस स्तर तक नहीं पहुंच पाई हैं, जहां वे डॉलर का पूर्ण विकल्प बन सकें।
इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर किसी एक नई मुद्रा को स्वीकार करना आसान नहीं है। ब्रिक्स देशों द्वारा साझा मुद्रा की चर्चा जरूर होती रही है, लेकिन इसके लिए आवश्यक राजनीतिक सहमति और आर्थिक समन्वय अभी दूर की बात है। चीन और भारत जैसे बड़े देशों के बीच मतभेद भी इस दिशा में बाधा बनते हैं।
हालांकि, यह भी सच है कि अमेरिका की नीतियों—विशेषकर व्यापार युद्ध, प्रतिबंध और अचानक लिए गए आर्थिक फैसलों—ने दुनिया को विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित किया है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है, तो आने वाले वर्षों में डॉलर का वर्चस्व धीरे-धीरे कम हो सकता है, भले ही वह पूरी तरह समाप्त न हो।
वैश्विक अर्थव्यवस्था एक संक्रमण काल से गुजर रही है। डॉलर अभी भी मजबूत है, लेकिन उसकी एकाधिकार स्थिति अब चुनौती के घेरे में है। यह बदलाव धीरे-धीरे और बहु-स्तरीय होगा, जहां विभिन्न मुद्राएं और भुगतान प्रणालियां समानांतर रूप से विकसित होंगी।
इस परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विश्व एक बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, जहां शक्ति और प्रभाव का संतुलन बदल रहा है। डॉलर जीवित है, लेकिन अब वह अकेला नहीं है।
|
आज का राशिफल

इस सप्ताह आपके लिए अनुकूल समय है। पेशेवर मोर्चे पर सफलता मिलने के योग हैं। व्यक्तिगत जीवन में भी सुकून और संतोष रहेगा।
भाग्यशाली रंग: लाल
भाग्यशाली अंक: 9
मंत्र: "ॐ हं राम रामाय नमः"

आज का मौसम

भोपाल

22° / 38°

SUNNY

ट्रेंडिंग न्यूज़