डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से बढ़ते असत्यापित और भ्रामक कंटेंट ने ऑनलाइन सुरक्षा व्यवस्था और जवाबदेही तंत्र पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं, जिससे प्रभावी और सख्त नियमन की आवश्यकता और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
13 अप्रैल।
भारत तेजी से डिजिटल युग की ओर बढ़ रहा है। इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच ने जानकारी को लोकतांत्रिक बना दिया है, जहां हर व्यक्ति कंटेंट क्रिएटर भी है और उपभोक्ता भी। इस बदलाव में यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। लेकिन जहां एक ओर यह प्लेटफॉर्म शिक्षा, मनोरंजन और जानकारी का सशक्त माध्यम बना है, वहीं दूसरी ओर अनियंत्रित और भ्रामक कंटेंट का अड्डा भी बनता जा रहा है। देशभर में करोड़ों यूट्यूब चैनलों के बीच एक बड़ा हिस्सा ऐसा है, जो बिना किसी विशेषज्ञता, जवाबदेही या नियमन के लोगों को सलाह दे रहा है। यह समस्या अब केवल डिजिटल स्पेस तक सीमित नहीं रही, बल्कि समाज, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और कानून-व्यवस्था पर भी प्रभाव डाल रही है।
भारत में अनुमानतः करोड़ों सक्रिय यूट्यूब चैनल हैं, जिनमें से केवल एक छोटा हिस्सा ही प्रोफेशनल और प्रमाणिक है। बाकी चैनलों में से कई बिना किसी सत्यापन के कंटेंट बना रहे हैं। यह कंटेंट केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि मेडिकल सलाह, निवेश मार्गदर्शन, कानूनी सुझाव, फिटनेस ट्रेनिंग और तकनीकी जानकारी तक फैला हुआ है। समस्या यह है कि इन कंटेंट क्रिएटर्स के पास न तो कोई प्रमाणित योग्यता होती है और न ही उनके दावों की कोई जवाबदेही तय होती है। परिणामस्वरूप, गलत जानकारी तेजी से फैलती है और लोग उसे सही मान लेते हैं।
एक चिंताजनक तथ्य यह है कि बड़ी संख्या में लोग यूट्यूब पर दी गई जानकारी पर बिना जांच-पड़ताल के भरोसा कर लेते हैं। इससे गलत धारणाएं बनती हैं और कई बार गंभीर परिणाम सामने आते हैं। उदाहरण के तौर पर, एक घटना में एक शिक्षित परिवार ने प्रसव के दौरान यूट्यूब वीडियो के आधार पर निर्णय लिया, जिसके कारण महिला की मृत्यु हो गई। यह केवल एक मामला नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि डिजिटल जानकारी पर अंधविश्वास कितना खतरनाक हो सकता है।
यूट्यूब पर फाइनेंशियल सलाह देने वाले कई चैनल लोगों को शेयर बाजार, खासकर ऑप्शन ट्रेडिंग में निवेश के लिए प्रेरित करते हैं। लेकिन इनमें से कई सलाहकार खुद ही बाजार में असफल होते हैं या लोगों को गुमराह करके पैसा कमाते हैं। एक मामले में एक यूट्यूबर ने निवेशकों से करोड़ों रुपये अवैध तरीके से जुटाए और गलत सलाह देकर उन्हें नुकसान पहुंचाया। जांच एजेंसियों द्वारा कार्रवाई के बावजूद, प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी तय नहीं हो पाई। यह दर्शाता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही अभी भी अस्पष्ट है।
भारत में डिजिटल कंटेंट को नियंत्रित करने के लिए कई कानून मौजूद हैं। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धाराएं गलत जानकारी फैलाने पर कार्रवाई की अनुमति देती हैं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 भ्रामक विज्ञापनों पर भारी जुर्माना लगाता है। भारतीय न्याय संहिता के तहत जानलेवा सलाह देने पर आपराधिक मामला दर्ज हो सकता है। इसके बावजूद, अधिकांश मामलों में दोषियों पर कार्रवाई नहीं हो पाती। इसका कारण है—कानूनों का कमजोर क्रियान्वयन और डिजिटल स्पेस की जटिलता।
आजकल अधिकांश यूट्यूब वीडियो में “यह केवल शैक्षिक उद्देश्य के लिए है” जैसे डिस्क्लेमर लिख दिए जाते हैं। इससे कंटेंट क्रिएटर अपनी जिम्मेदारी से बच निकलते हैं। वास्तव में, यह एक कानूनी खामी बन गई है, जहां गलत या खतरनाक सलाह देने के बावजूद कोई स्पष्ट जवाबदेही तय नहीं होती। सवाल यह है कि क्या केवल एक लाइन का डिस्क्लेमर किसी की जान या धन के नुकसान की भरपाई कर सकता है?
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स अक्सर खुद को “इंटरमीडियरी” यानी केवल माध्यम बताते हैं, लेकिन यह तर्क अब कमजोर पड़ रहा है। एल्गोरिदम यह तय करते हैं कि कौन सा वीडियो किसे दिखेगा। इस प्रकार, प्लेटफॉर्म केवल निष्क्रिय माध्यम नहीं हैं, बल्कि कंटेंट के प्रसार में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। इसलिए उनकी जवाबदेही तय करना जरूरी है।
डिजिटल नुकसान के मामलों में पीड़ितों के लिए न्याय पाना बेहद कठिन है। छोटे आर्थिक या शारीरिक नुकसान के लिए लोग कोर्ट नहीं जाते, क्योंकि प्रक्रिया लंबी, महंगी और जटिल होती है। इसके अलावा, डिजिटल अपराधों के लिए कोई विशेष फास्ट-ट्रैक प्रणाली नहीं है। परिणामस्वरूप, अधिकांश अपराधी बच निकलते हैं और पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाता।
इस समस्या का समाधान केवल कानून बनाने से नहीं होगा, बल्कि प्रभावी नियमन और जागरूकता दोनों जरूरी हैं। विशेषज्ञता-आधारित श्रेणीकरण, डिजिटल लाइसेंसिंग सिस्टम, एल्गोरिदमिक पारदर्शिता, त्वरित शिकायत निवारण और सख्त दंड जैसे कदम आवश्यक हैं।
सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है कि लोगों को डिजिटल साक्षर बनाया जाए। लोगों को यह समझना होगा कि हर ऑनलाइन जानकारी सही नहीं होती। स्कूलों और कॉलेजों में डिजिटल साक्षरता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, ताकि युवा वर्ग सही और गलत जानकारी में अंतर कर सके।
डिजिटल प्लेटफॉर्म ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नया आयाम दिया है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी आती है। आज यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर अनियंत्रित कंटेंट एक गंभीर सामाजिक चुनौती बन चुका है। यदि समय रहते इस पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समाज की संरचना और विश्वास प्रणाली को भी प्रभावित करेगा। “डिजिटल भारत” का सपना तभी साकार होगा, जब यह केवल तकनीकी रूप से उन्नत नहीं, बल्कि नैतिक और जिम्मेदार भी हो। इसके लिए सरकार, प्लेटफॉर्म और नागरिक—तीनों को मिलकर काम करना होगा।