संपादकीय
21 May, 2026

एसआईआर के बाद भी गड़बड़: मप्र की वोटर लिस्ट में 58 लाख ‘एक्स्ट्रा वोटर्स’, गांव-शहर दोनों सूचियों में नाम

मध्य प्रदेश में एसआईआर के बाद भी मतदाता सूची में करीब 58 लाख अतिरिक्त नाम सामने आने से विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनाव प्रणाली की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं, जिनमें डुप्लीकेट और शिफ्टेड वोटरों की बड़ी भूमिका बताई जा रही है।

भोपाल, 21 मई।

प्रदेश में आगामी वर्ष जून-जुलाई में होने वाले नगरीय निकाय और पंचायत चुनावों से पहले मतदाता सूचियों में बड़ी विसंगति उजागर हुई है। विधानसभा चुनाव की सूची और स्थानीय निकाय की सूची में लगभग 58 लाख नामों का अंतर पाया गया है, जिससे चुनावी प्रणाली की शुद्धता पर प्रश्न उठने लगे हैं।

केंद्रीय निर्वाचन सूची के अनुसार प्रदेश में मतदाताओं की संख्या लगभग 5 करोड़ 39 लाख है, जबकि राज्य निर्वाचन आयोग की नगरीय निकाय और पंचायत सूची में यह संख्या बढ़कर 5 करोड़ 97 लाख तक पहुंच रही है। इस प्रकार लाखों नाम ऐसे सामने आए हैं, जिन्हें अतिरिक्त माना जा रहा है।

सबसे गंभीर पहलू यह है कि विधानसभा चुनाव से पहले किए गए विशेष पुनरीक्षण के दौरान हटाए गए डुप्लीकेट नामों में से कई अब भी स्थानीय निकायों की सूची में मौजूद हो सकते हैं। यह तथ्य राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा केंद्रीय आयोग से अद्यतन सूची मांगे जाने के बाद सामने आया।

जांच में इस अंतर के पीछे तीन प्रमुख कारण सामने आए हैं। पहला, एक ही निकाय में एक से अधिक स्थानों पर दर्ज डुप्लीकेट मतदाता। दूसरा, एक से अधिक निकायों में नाम दर्ज कराने वाले मतदाता। तीसरा, गांव से शहर में स्थानांतरित होने के बावजूद पंचायत सूची से नाम न हटवाने वाले शिफ्टेड मतदाता।

जिलेवार आंकड़ों में ग्वालियर और भोपाल में सबसे बड़ा अंतर दर्ज हुआ है। ग्वालियर में लगभग दो लाख और भोपाल में लगभग एक लाख बानवे हजार अतिरिक्त नाम पाए गए हैं। उज्जैन, छिंदवाड़ा, खरगोन, राजगढ़, रीवा, सतना, धार, विदिशा, सीहोर और आगर मालवा सहित कई जिलों में भी हजारों की संख्या में अंतर सामने आया है।

यह अंतर किसी भी निकाय चुनाव के परिणाम को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। विशेषज्ञों के अनुसार मतदाता सूची में विसंगति के पीछे मुख्य कारण दो अलग-अलग संस्थाओं द्वारा सूची तैयार करना और डेटाबेस का अलग-अलग होना है, जिससे समन्वय की कमी बनी रहती है।

इसके अलावा कई मतदाता जानबूझकर दो स्थानों पर नाम बनाए रखते हैं ताकि सरकारी योजनाओं और स्थानीय सुविधाओं का लाभ लिया जा सके। साथ ही भौतिक सत्यापन की कमी, नामों की वर्तनी में मामूली अंतर और तकनीकी सीमाएं भी डुप्लीकेट पहचान में बाधा बनती हैं।

यह स्थिति केवल आंकड़ों की नहीं बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ी है, क्योंकि लाखों अतिरिक्त नाम मतदान प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं और फर्जी मतदान की आशंका को बढ़ा सकते हैं। इससे चुनाव परिणामों पर भी सीधा असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।

अब आवश्यकता एकीकृत मतदाता सूची, आधार आधारित पहचान, भौतिक सत्यापन और आधुनिक तकनीक के उपयोग की बताई जा रही है, ताकि सभी सूचियों में एकरूपता लाई जा सके और डुप्लीकेट नामों को समाप्त किया जा सके।

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