इंदौर, 27 मई।
इंदौर-पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र से जुड़े विकास कार्य अब किसानों की मांगों के बीच ठहराव की स्थिति में पहुंचते दिख रहे हैं। इंदौर-पीथमपुर आर्थिक गलियारे सहित मोहासा-बाबई नवीकरणीय ऊर्जा पार्क, बीना रिफाइनरी विस्तार और विक्रम उद्योगपुरी जैसी हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाएं चार गुना मुआवजे की मांग के कारण आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। राज्य मंत्रिमंडल ने भले ही भूमि अधिग्रहण पर चार गुना मुआवजा देने का निर्णय लिया हो, लेकिन अब किसान स्पष्ट कर रहे हैं कि उन्हें जमीन के बदले जमीन नहीं, बल्कि नकद मुआवजा चाहिए। यह बदलाव केवल नीति का नहीं बल्कि सोच में आए परिवर्तन का भी संकेत माना जा रहा है। राज्य सरकार के सामने यह बड़ा सवाल खड़ा है कि विकास परियोजनाओं और किसानों के हितों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
इंदौर-पीथमपुर क्षेत्र में शामिल किसानों ने शुरुआत में दो गुना मुआवजा या भूमि के बदले भूमि स्वीकार करने की सहमति जताई थी, लेकिन सरकार द्वारा चार गुना मुआवजे की घोषणा के बाद उनकी मांगों में बदलाव आ गया। नरवल गांव के किसान प्रशांत पाटीदार का कहना है कि पहले दो गुना मुआवजे की चर्चा थी, लेकिन अब किसान चार गुना मुआवजे की मांग पर अड़े हैं।
किसानों के इस बदले हुए रुख के पीछे कई आर्थिक और सामाजिक कारण बताए जा रहे हैं। खेती लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही है, जहां खाद, बीज और डीजल की लागत बढ़ी है और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पूरी खरीद भी सुनिश्चित नहीं हो पाती। मौसम की मार अलग से पड़ रही है। नई पीढ़ी खेती छोड़कर अन्य रोजगारों की ओर बढ़ रही है। ऐसे में किसान दूसरी जमीन लेकर फिर उसी संघर्ष में नहीं फंसना चाहते और एकमुश्त नकद राशि को बेहतर विकल्प मान रहे हैं, ताकि उसे व्यवसाय, परिवहन या बच्चों की शिक्षा में लगाया जा सके।
किसानों का यह भी कहना है कि भूमि के बदले जो जमीन दी जाती है, वह अक्सर दूरस्थ, अनुपजाऊ या विवादित क्षेत्रों में होती है, जहां सिंचाई, बिजली और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं होतीं। कई बार कानूनी विवादों के कारण उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में नकद मुआवजा अधिक व्यावहारिक विकल्प माना जा रहा है।
इंदौर-पीथमपुर क्षेत्र में भूमि की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है। बीस किलोमीटर लंबे इस मार्ग से इंदौर की व्यापारिक क्षमता और पीथमपुर की औद्योगिक ताकत को नई दिशा मिलने की उम्मीद है। सड़क के दोनों ओर तीन-तीन सौ मीटर क्षेत्र को आर्थिक क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाना है। किसानों का मानना है कि भविष्य में उनकी जमीन की कीमत और बढ़ेगी, इसलिए वे सर्किल रेट के बजाय बाजार मूल्य के आधार पर चार गुना मुआवजे की मांग कर रहे हैं।
दो हजार तीन सौ साठ करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली इस परियोजना में मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम पहले चरण में लगभग सत्तर प्रतिशत भूमि का अधिग्रहण कर चुका है। पहले चरण में तीन सौ करोड़ रुपये की लागत से चौदह दशमलव अट्ठाईस किलोमीटर सड़क प्रस्तावित है, जिसमें पांच किलोमीटर चौड़ीकरण और नौ किलोमीटर ग्रीनफील्ड सड़क शामिल है। इस परियोजना से लगभग पांच लाख प्रत्यक्ष और एक लाख अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने का अनुमान है, लेकिन चार गुना मुआवजे की स्थिति में भूमि अधिग्रहण लागत लगभग छह हजार करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है, जिससे परियोजना की गति प्रभावित हुई है।
इसी तरह मोहासा-बाबई नवीकरणीय ऊर्जा औद्योगिक क्षेत्र, बीना रिफाइनरी विस्तार और उज्जैन की विक्रम उद्योगपुरी परियोजना में भी भूमि अधिग्रहण जारी है। नर्मदापुरम जिले में मोहासा-बाबई क्षेत्र के विस्तार के लिए पांच सौ हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि प्रस्तावित है। बीना रिफाइनरी के पास तीन हजार एक सौ एकड़ में पेट्रोकेमिकल और औद्योगिक केंद्र विकसित करने की योजना है, जबकि विक्रम उद्योगपुरी के दूसरे चरण के लिए चार सौ अठासी हेक्टेयर से अधिक भूमि अधिग्रहण प्रस्तावित है।
मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम के प्रबंध संचालक का कहना है कि चार गुना मुआवजे का प्रावधान लागू है और उसी के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। वर्ष दो हजार तेरह के भूमि अधिग्रहण कानून में ग्रामीण क्षेत्रों में चार गुना और शहरी क्षेत्रों में दो गुना मुआवजे का प्रावधान पहले से मौजूद है। लेकिन वर्तमान में असली विवाद भूमि के बदले भूमि और नकद भुगतान को लेकर गहराता जा रहा है।
सरकार के लिए यह स्थिति चुनौती के साथ अवसर भी लेकर आई है। किसान चाहते हैं कि उन्हें केवल विस्थापित न किया जाए, बल्कि आर्थिक रूप से सशक्त भी बनाया जाए। यह मांग पूरी तरह अव्यावहारिक भी नहीं मानी जा रही है। यदि सरकार समयबद्ध भुगतान, रोजगार की गारंटी और पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित करे तो समाधान संभव है।
अमरावती और नवी मुंबई की तर्ज पर भूमि पूलिंग मॉडल अपनाने का सुझाव भी सामने आया है, जिसमें किसानों की जमीन लेकर उन्हें विकसित भूखंड का हिस्सा लौटाया जाए। इससे किसानों को भविष्य का लाभ मिलेगा और परियोजनाओं के लिए भूमि भी उपलब्ध रहेगी। साथ ही प्रभावित परिवार के एक सदस्य को रोजगार या कौशल प्रशिक्षण देने से स्थानीय भरोसा भी मजबूत हो सकता है।
इंदौर-पीथमपुर क्षेत्र राज्य को उद्योग, निवेश और रोजगार का बड़ा केंद्र बना सकता है, लेकिन यह तभी संभव होगा जब किसान खुद को असुरक्षित महसूस न करें। भूमि के बदले नकद मुआवजे की मांग ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बदलते दृष्टिकोण का संकेत है। अब आवश्यकता इस बात की है कि सरकार ऐसा संतुलित और सम्मानजनक मॉडल तैयार करे, जिससे विकास और किसान दोनों साथ आगे बढ़ सकें।













