संपादकीय
29 May, 2026

न्यायपालिका की सक्रियता या व्यवस्था की विफलता?

सड़क सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता और संविधान के अनुच्छेद 21 व 142 के तहत दिए गए निर्देशों के बीच भारत में बढ़ते सड़क हादसों और प्रशासनिक विफलताओं पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

नई दिल्ली, 29 मई।

भारत में सड़क हादसे अब केवल दुर्घटनाएं नहीं रह गए, बल्कि एक राष्ट्रीय आपदा का रूप ले चुके हैं। हर दिन सैकड़ों लोग सड़कों पर अपनी जान गंवा रहे हैं और सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन मौतों का बड़ा हिस्सा रोका जा सकता था। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में राष्ट्रीय राजमार्गों पर सुरक्षित यात्रा को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत “जीवन के अधिकार” का हिस्सा मानते हुए इसे मौलिक अधिकार घोषित किया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि सुरक्षित सड़कें और जवाबदेह यातायात व्यवस्था सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है, केवल नीतिगत वादा नहीं।

यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत दिया गया, जो सुप्रीम कोर्ट को “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने की विशेष शक्ति देता है। जब कानून या प्रशासन नागरिकों को न्याय देने में असफल दिखाई दें, तब अदालत इस अनुच्छेद के जरिए सीधे हस्तक्षेप कर सकती है। नवंबर 2025 में राजस्थान और तेलंगाना में हुए दो बड़े सड़क हादसों में 34 लोगों की मौत के बाद अदालत ने स्वतः संज्ञान लिया और केंद्र व राज्यों को व्यापक निर्देश जारी किए।

देश में सड़क सुरक्षा की स्थिति भयावह है। सड़क परिवहन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2025 में राष्ट्रीय राजमार्गों पर 57,482 लोगों की मौत हुई, हालांकि यह 2024 के मुकाबले लगभग 11 प्रतिशत कम है। इसके बावजूद यह संख्या किसी युद्ध जैसी त्रासदी से कम नहीं। केवल 2025 के पहले छह महीनों में ही राष्ट्रीय राजमार्गों पर 26,770 लोगों की जान चली गई।

पूरे देश की तस्वीर और भी गंभीर है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार 2024-25 के दौरान भारत में सड़क हादसों में मरने वालों की संख्या 1.7 लाख से अधिक रही। इनमें करीब 70 प्रतिशत मौतें ओवरस्पीडिंग के कारण हुईं, जबकि हेलमेट और सीट बेल्ट का इस्तेमाल न करने से लगभग 39 प्रतिशत जानें गईं। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी भारत को सड़क दुर्घटनाओं से सबसे अधिक प्रभावित देशों में गिनता है।

सवाल यह है कि जब हर साल हजारों करोड़ रुपये टोल टैक्स के रूप में वसूले जा रहे हैं, तब सड़कें सुरक्षित क्यों नहीं हैं? मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में तो स्थिति और विडंबनापूर्ण है। हाल ही में सामने आए आंकड़ों के अनुसार 2020 से 2024 के बीच प्रदेश में टोल वसूली दोगुनी हुई, लेकिन गड्ढों से होने वाली मौतें तीन गुना बढ़ गईं।

न्यायपालिका का यह हस्तक्षेप आवश्यक दिखाई देता है, लेकिन यह लोकतंत्र के लिए आदर्श स्थिति नहीं कही जा सकती। सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करना अदालत का नहीं, सरकार और प्रशासन का काम है। जब व्यवस्थाएं संवेदनहीन हो जाती हैं और जवाबदेही कमजोर पड़ जाती है, तब अदालतों को आगे आना पड़ता है।

अनुच्छेद 142 कोई राजनीतिक शक्ति नहीं, बल्कि संविधान का सुरक्षा कवच है। इसका उद्देश्य सरकार चलाना नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यदि सरकारें अपनी जिम्मेदारियां ईमानदारी से निभाएं, तो अदालतों को बार-बार “पूर्ण न्याय” की शक्ति का प्रयोग करने की जरूरत ही न पड़े। आखिर लोकतंत्र अदालतों के सहारे नहीं, जवाबदेह शासन व्यवस्था के सहारे मजबूत होता है।

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