मंडला, 5 जून ।
कान्हा टाइगर रिजर्व देश की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहरों में गिना जाता है। बाघों और दुर्लभ बारहसिंघा के संरक्षण के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध यह क्षेत्र केवल मध्यप्रदेश की नहीं, बल्कि पूरे देश की अमानत है। ऐसे में यदि इसके बफर और ईको-सेंसिटिव जोन में नियमों की अनदेखी कर व्यावसायिक निर्माण खड़े हो जाएं, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संरक्षण व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।
मंडला जिले के बिछिया क्षेत्र में हुई जांच में खटिया गेट से मोचा सफारी जोन तक संचालित 35 होम-स्टे, होटल और रिसॉर्ट्स की जांच की गई। इनमें से 11 प्रतिष्ठानों को आवश्यक अनुमति और एनओसी (NOC) के अभाव में अवैध पाया गया। संबंधित संचालकों को नोटिस जारी किए गए हैं और मामला आगे की प्रक्रिया के लिए भेजा गया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि ये निर्माण नियमों के विपरीत थे, तो वर्षों तक इन्हें संचालित होने की अनुमति कैसे मिली?
वन्यजीव संरक्षण से जुड़े नियम स्पष्ट हैं। संरक्षित क्षेत्रों और उनके आसपास निर्माण गतिविधियों के लिए निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन अनिवार्य है। इसका उद्देश्य केवल कागजी औपचारिकता नहीं, बल्कि जंगलों, वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। यदि बिना आवश्यक स्वीकृतियों के व्यावसायिक प्रतिष्ठान विकसित होते रहे, तो यह निगरानी तंत्र की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
यह मामला "होम-स्टे" की मूल अवधारणा पर भी बहस खड़ी करता है। होम-स्टे का उद्देश्य स्थानीय परिवारों, विशेषकर आदिवासी और ग्रामीण समुदायों को पर्यटन से आय का अवसर प्रदान करना था। लेकिन यदि इस व्यवस्था का उपयोग बड़े पैमाने पर व्यावसायिक गतिविधियों के लिए होने लगे, तो नीति के उद्देश्य और उसके क्रियान्वयन के बीच अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। पर्यटन को बढ़ावा देना आवश्यक है, किंतु वह संरक्षण की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
कान्हा की अर्थव्यवस्था में पर्यटन की महत्वपूर्ण भूमिका है। हजारों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि यहां आने वाले पर्यटक जंगल, बाघ और प्राकृतिक वातावरण को देखने आते हैं। यदि अनियंत्रित निर्माण और व्यावसायिक विस्तार से पारिस्थितिक संतुलन प्रभावित होता है, तो सबसे बड़ा नुकसान स्वयं पर्यटन उद्योग को ही होगा।
इसलिए अब आवश्यकता केवल नोटिस जारी करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जिन मामलों में नियमों का उल्लंघन सिद्ध हो, वहां कानून के अनुसार समयबद्ध कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही यह भी जांचना जरूरी है कि संबंधित अवधि में निगरानी और अनुमति प्रक्रिया में किस स्तर पर चूक हुई। जवाबदेही तय किए बिना ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना संभव नहीं होगा।
कान्हा का प्रश्न केवल 11 अवैध प्रतिष्ठानों का नहीं है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है जो एक ओर पर्यावरण संरक्षण की बात करती है और दूसरी ओर उसके पालन को सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी निभाती है। यदि कानून का सम्मान बनाए रखना है, तो उसका पालन सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए। कान्हा को केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि प्रभावी और निष्पक्ष कार्रवाई की आवश्यकता है।














