संपादकीय
05 Jun, 2026

सीमा विवाद पर नेपाल का बदलता दृष्टिकोण: 'रोटी-बेटी' के रिश्ते से 'नक्शा-नीति' तक का सफर

नेपाल के बदले रुख और सीमा विवाद पर नरमी के संकेतों से भारत-नेपाल संबंधों में सुधार की संभावनाएं बढ़ी हैं, हालांकि कई मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं।

जोधपुर, 5 जून।

जोधपुर में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बयान आया है कि अब नेपाल भारत की भूमि को अतिक्रमण की दृष्टि से नहीं देखता। चीन के दबाव से निकलता काठमांडू और संबंधों में लौटती नई गर्माहट, दोनों देशों के रिश्तों में सकारात्मक बदलाव का संकेत है।

भारत और नेपाल के बीच 'रोटी-बेटी' का रिश्ता सदियों पुराना है। खुली सीमा, समान संस्कृति, धर्म और जनभावनाओं ने दोनों देशों को हमेशा जोड़े रखा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह रिश्ता सीमा विवाद की भेंट चढ़ गया था। कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर नेपाल ने एक नया नक्शा जारी कर भारत की भूमि पर दावा ठोक दिया था। चीन के प्रभाव में आकर काठमांडू ने 2020 में संविधान संशोधन कर इन क्षेत्रों को अपना बताया था। पर अब परिस्थितियां बदलती दिखाई दे रही हैं। जोधपुर में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि अब नेपाल भारत को अतिक्रमणकारी के रूप में नहीं देखता। यह बयान केवल शब्द नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच जमी बर्फ के पिघलने का संकेत है।

मई 2020 में भारत ने धारचूला-लिपुलेख सड़क का उद्घाटन किया था। नेपाल ने इस पर आपत्ति जताई और जवाब में नया राजनीतिक नक्शा जारी कर दिया। इसमें कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा सहित लगभग 335 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार ने इसे संविधान का हिस्सा भी बना दिया। भारत ने इसे एकतरफा और कृत्रिम विस्तार बताया। इसके बाद दोनों देशों के बीच संवाद लगभग ठप हो गया। चीन ने भी इस विवाद को हवा देने का प्रयास किया। बीआरआई (BRI) परियोजनाओं, पोखरा एयरपोर्ट के कर्ज और राजनीतिक दखल के जरिए नेपाल को भारत के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश हुई। लेकिन काठमांडू को जल्द ही समझ आ गया कि चीन का कर्ज जाल श्रीलंका और पाकिस्तान जैसी परिस्थितियां पैदा कर सकता है।

जोधपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नेपाल के बदले रुख पर मुहर लगाई। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत-नेपाल संबंधों में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन अब नेपाल की सरकार और जनता का दृष्टिकोण बदल रहा है। वे भारत को दोस्त मानते हैं, अतिक्रमणकारी नहीं। यह बयान हल्के में लेने योग्य नहीं है। यह खुफिया एजेंसियों, राजनयिक चैनलों और बैकडोर कूटनीति से मिले संकेतों का परिणाम माना जा सकता है। नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' ने भी अपनी भारत यात्रा के दौरान सीमा विवाद को ऐतिहासिक मुद्दा बताते हुए उसके महत्व को कम करने का प्रयास किया था। अब नेपाली सेना प्रमुख का भारत दौरा भी संबंधों में सुधार का संकेत है।

नेपाल के दृष्टिकोण में बदलाव के पीछे कई कारण हैं। पहला, चीन का वास्तविक चेहरा सामने आना। चीन ने पोखरा इंटरनेशनल एयरपोर्ट तो बना दिया, लेकिन वहां अपेक्षित संख्या में बड़े विमान नहीं उतर पा रहे हैं। भारी कर्ज के बावजूद आर्थिक लाभ सीमित रहा है। बीआरआई परियोजनाओं को लेकर भी वहां असंतोष बढ़ा है। दूसरा, भारत के साथ नेपाल के गहरे आर्थिक और सामाजिक संबंध हैं। दोनों देशों के बीच लगभग 16,000 करोड़ रुपये का व्यापार होता है और लाखों नेपाली नागरिक भारत में रोजगार पाते हैं। तीसरा, भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति ने विश्वास बढ़ाया है। कोविड काल में वैक्सीन सहायता, भूकंप के दौरान मदद, पेट्रोलियम पाइपलाइन, बिजली ट्रांसमिशन लाइन और रेल कनेक्टिविटी जैसी परियोजनाओं ने संबंधों को मजबूती दी है। चौथा, नेपाल की घरेलू राजनीति भी अब भारत-विरोध की बजाय विकास और स्थिरता पर अधिक केंद्रित दिखाई देती है।

कालापानी विवाद का मूल प्रश्न काली नदी के वास्तविक उद्गम को लेकर है। 1816 की सुगौली संधि में काली नदी को सीमा माना गया था। भारत और नेपाल इस नदी के स्रोत की अलग-अलग व्याख्या करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि संयुक्त नदी आयोग और आधुनिक सैटेलाइट सर्वेक्षण के माध्यम से इस विवाद का समाधान निकाला जा सकता है। उल्लेखनीय है कि भारत-नेपाल सीमा का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा निर्विवाद है और विवाद केवल एक सीमित क्षेत्र तक ही सीमित है।

आगे बढ़ने के लिए विदेश सचिव स्तर की वार्ताओं को फिर से सक्रिय करना, सीमा तंत्र की बैठकों को नियमित बनाना, लोगों के बीच संपर्क बढ़ाना, सुरक्षा सहयोग मजबूत करना और नेपाल को आर्थिक विकल्प उपलब्ध कराना आवश्यक होगा। इससे चीन पर उसकी निर्भरता कम हो सकती है।

नेपाल का बदला हुआ रुख भारत की कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जा सकता है। यह संकेत देता है कि पड़ोसी देशों के साथ संवाद, सहयोग और विकास आधारित नीति दीर्घकाल में अधिक प्रभावी साबित होती है। फिर भी सतर्कता जरूरी है, क्योंकि नेपाल की आंतरिक राजनीति और चीन की सक्रियता भविष्य में परिस्थितियों को प्रभावित कर सकती है। भारत को 'बड़े भाई' की छवि से आगे बढ़कर समान भागीदार की भूमिका निभानी होगी। नेपाल की संप्रभुता का सम्मान करते हुए विकास और विश्वास की साझेदारी ही स्थायी समाधान का मार्ग है। आखिरकार, 'रोटी-बेटी' का रिश्ता किसी भी नक्शे से बड़ा होता है और यही संबंध दोनों देशों के भविष्य की सबसे मजबूत नींव है।

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