अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के दौरान समुद्री नाकेबंदी और सैन्य कार्रवाई से जुड़े मुद्दों पर उठे सवालों के बीच यह चिंता सामने आई है कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं लड़ा जाता, बल्कि इसके पीछे नीतिगत और संस्थागत निर्णय भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में संतुलन और जवाबदेही बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।
09 मई।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनातनी ने दुनिया को फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या केवल बम और मिसाइलें चलने से ही युद्ध माना जाएगा। किसी देश की समुद्री सीमाओं पर सैन्य दबाव बनाना, उसके व्यापारिक रास्तों को रोकना और नौसेना के जरिए उसकी गतिविधियों पर नियंत्रण रखना भी दरअसल युद्ध का ही एक रूप है। चाहे उसे कितने ही नरम शब्दों में पेश किया जाए, लेकिन सच्चाई यही है कि नाकेबंदी हमेशा टकराव और शक्ति प्रदर्शन का संकेत होती है। ऐसे में यदि कोई सरकार इसे “दोस्ताना कदम” बताने की कोशिश करे, तो यह वास्तविक स्थिति को छिपाने जैसा ही लगता है।
अमेरिकी प्रशासन यह दावा कर रहा है कि ईरान के साथ संघर्षविराम लागू हो चुका है, इसलिए अब औपचारिक युद्ध जैसी स्थिति नहीं है। लेकिन दूसरी ओर अमेरिकी नौसेना अब भी समुद्री नाकेबंदी जारी रखे हुए है। यह विरोधाभास केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि संवैधानिक और लोकतांत्रिक जवाबदेही से बचने का प्रयास भी माना जा रहा है। किसी भी देश की सैन्य कार्रवाई यदि लगातार जारी रहे, तो उसे केवल “रोकथाम” कहकर युद्ध की वास्तविकता से अलग नहीं किया जा सकता।
सबसे गंभीर प्रश्न अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस की भूमिका को लेकर उठ रहा है। अमेरिकी संविधान में युद्ध और सैन्य कार्रवाई को लेकर स्पष्ट व्यवस्था है कि लंबे समय तक चलने वाले किसी भी संघर्ष के लिए संसद की अनुमति आवश्यक होगी। वियतनाम युद्ध के बाद इसी उद्देश्य से “वार पॉवर्स रिजोल्यूशन” लागू किया गया था, ताकि कोई भी राष्ट्रपति सीमित सैन्य कार्रवाई को अनिश्चितकालीन युद्ध में न बदल सके। लेकिन आज स्थिति यह दिखाई दे रही है कि राष्ट्रपति की शक्ति के सामने संसद की भूमिका कमजोर पड़ती जा रही है।
डोनाल्ड ट्रंप का तर्क यह है कि पूर्व राष्ट्रपति भी कई बार बिना औपचारिक अनुमति के सैन्य कार्रवाई करते रहे हैं, इसलिए वर्तमान प्रशासन की नीति भी असामान्य नहीं है। यह सोच लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत देती है। यदि अतीत में हुई संवैधानिक कमजोरियों को ही भविष्य का आधार बना लिया जाए, तो फिर संसद की स्वीकृति जैसी प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी।
असल समस्या केवल ईरान या अमेरिका तक सीमित नहीं है। यह उस वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा है, जहां कार्यपालिका धीरे-धीरे युद्ध और सुरक्षा के नाम पर अधिक शक्तिशाली होती जा रही है, जबकि जनप्रतिनिधि संस्थाएं पीछे हटती दिख रही हैं। संसदें बहस तो करती हैं, बयान भी देती हैं, लेकिन निर्णायक मतदान से बचती हैं। इससे जनता के सामने जवाबदेही का संकट पैदा होता है।
किसी भी लोकतंत्र में युद्ध केवल सैन्य निर्णय नहीं होता, बल्कि राजनीतिक और नैतिक जिम्मेदारी भी होता है। सैनिक सीमा पर लड़ते हैं, लेकिन युद्ध का निर्णय निर्वाचित प्रतिनिधियों को लेना चाहिए। यदि संसद यह तय ही न करे कि देश युद्ध में है या नहीं, तो लोकतंत्र की मूल भावना कमजोर पड़ जाती है। इससे सैन्य कार्रवाई धीरे-धीरे “स्थायी संघर्ष” का रूप लेने लगती है, जिसका न स्पष्ट लक्ष्य होता है और न समाप्ति की निश्चित दिशा।
इतिहास गवाह है कि लंबे युद्ध अक्सर इसी तरह शुरू होते हैं — पहले सीमित कार्रवाई, फिर रणनीतिक दबाव, उसके बाद निरंतर सैन्य उपस्थिति। धीरे-धीरे जनता भी युद्ध को सामान्य स्थिति मानने लगती है। यही कारण है कि आधुनिक लोकतंत्रों में युद्ध संबंधी फैसलों पर संस्थागत नियंत्रण को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
ईरान के संदर्भ में भी यही सवाल सबसे महत्वपूर्ण है कि यदि अमेरिका वास्तव में संघर्ष समाप्त करना चाहता है, तो समुद्री नाकेबंदी क्यों जारी है? और यदि नाकेबंदी आवश्यक है, तो फिर संसद से स्पष्ट अनुमति क्यों नहीं ली जा रही? लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वही होती है, जब सत्ता युद्ध तो चलाती रहे लेकिन उसकी राजनीतिक जिम्मेदारी लेने से बचती रहे।
आज आवश्यकता केवल सैन्य समाधान खोजने की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बचाने की भी है। क्योंकि जब युद्ध का निर्णय संसद से निकलकर केवल कार्यपालिका के हाथों में सिमटने लगता है, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे शक्ति संतुलन खोने लगता है। और यही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा है।