नई दिल्ली, 04 मई।
नेपाल द्वारा उठाई गई आपत्तियों पर प्रतिक्रिया देते हुए भारत ने स्पष्ट किया कि कैलाश मानसरोवर यात्रा का लिपुलेख दर्रा एक पुराना और स्थापित मार्ग है, जिसका उपयोग वर्ष 1954 से निरंतर किया जा रहा है और यह परंपरा लंबे समय से जारी है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि इस विषय पर नेपाल की ओर से व्यक्त किए गए क्षेत्रीय दावे न तो तथ्यों पर आधारित हैं और न ही ऐतिहासिक प्रमाणों से समर्थित हैं, इसलिए इन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता।
नेपाल की ओर से यह भी दावा किया गया था कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी क्षेत्र 1816 की संधि के अनुसार उसके हिस्से हैं, और इस संबंध में उसने भारत तथा चीन को कूटनीतिक माध्यमों से अपनी चिंता अवगत कराई है।
भारत ने दोहराया कि वह नेपाल के साथ द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े सभी मुद्दों पर बातचीत के लिए सदैव तत्पर है, हालांकि इस प्रकार के दावे वास्तविकता और ऐतिहासिक साक्ष्यों से मेल नहीं खाते।





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