नई दिल्ली, 4 मई।
देश में बच्चों की स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम 2.0 के नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। यह दिशा-निर्देश हाल ही में आयोजित सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत किए गए।
नए प्रावधानों में पहले से लागू चार प्रमुख क्षेत्रों—जन्मजात दोष, बीमारियां, पोषण की कमी और विकास में देरी—को और अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया गया है। इसके साथ ही अब गैर-संचारी रोगों, मानसिक स्वास्थ्य तथा व्यवहार संबंधी समस्याओं को भी इसमें शामिल किया गया है।
इस कार्यक्रम के अंतर्गत जन्म से लेकर अठारह वर्ष तक के बच्चों की नियमित जांच और देखभाल की व्यवस्था की गई है, जिसमें रोकथाम, उपचार और जागरूकता पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
अब बच्चों की स्वास्थ्य जांच का दायरा बढ़ाकर विकास संबंधी समस्याओं, मानसिक स्थिति तथा मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसे रोगों के संभावित जोखिम तक कर दिया गया है।
बच्चों की जांच पहले की तरह आंगनवाड़ी केंद्रों और विद्यालयों में मोबाइल स्वास्थ्य दलों के माध्यम से की जाएगी, जिससे अधिक से अधिक बच्चों तक पहुंच सुनिश्चित हो सके और समस्याओं की समय पर पहचान की जा सके।
दिशा-निर्देशों में संदर्भ व्यवस्था को भी मजबूत किया गया है, ताकि जांच से लेकर उपचार तक की सुविधा बच्चों को समय पर उपलब्ध हो सके।
इसके अतिरिक्त डिजिटल स्वास्थ्य कार्ड, वास्तविक समय डेटा प्रणाली और निगरानी के लिए एकीकृत मंच की व्यवस्था की गई है, जिससे कार्यक्रम की पारदर्शिता और प्रभावशीलता बढ़ सके।
सरकार ने स्वास्थ्य, शिक्षा तथा महिला एवं बाल विकास विभागों के बीच समन्वय को और मजबूत करने पर भी बल दिया है, ताकि बच्चों को समग्र स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें।
कुल मिलाकर यह पहल बच्चों के स्वास्थ्य सुधार और उनके सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।





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