भोपाल, 23 अप्रैल
मध्य प्रदेश के इंदौर जिले के धुलेट गांव में एक महिला किसान ने पराली जलाने की आदत को बदलने का बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत किया है। पपीता रावत ने न केवल अन्य किसानों को पराली जलाने के नुकसान से अवगत कराया, बल्कि इसके बजाय भूसा बनाने के फायदे समझा कर 600 बीघा से ज्यादा खेतों में पराली जलाने की समस्या से निपटा। पपीता रावत, जो एक स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष हैं, पहले सिलाई कार्य से शुरुआत की थी और बाद में कृषि गतिविधियों में रुचि लेने के बाद 'स्ट्रा रीपर मशीन' खरीदी, जिससे अब वह किसानों को पराली जलाने के नुकसान के बारे में जागरूक करती हैं।
पपीता ने बताया कि इस बार के फसल कटाई के दौरान धुलेट और आसपास के सभी खेतों में पराली जलाने का कोई मामला नहीं आया। उन्होंने किसानों को बताया कि पराली से भूसा कैसे तैयार किया जा सकता है, जो मवेशियों के लिए फायदेमंद होता है। अब कई किसान इस भूसे का उपयोग मवेशियों के ‘केटल फीड’ के रूप में कर रहे हैं, जो उनकी आर्थिक स्थिति में भी सुधार ला रहा है।
इस परियोजना की सफलता में आस्था संकुल संगठन खुड़ैल और आजीविका मिशन के अधिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पपीता रावत ने अब पशुपालन से भी जुड़कर दूध उत्पादन का व्यवसाय शुरू किया है और चार मवेशियों के माध्यम से यह कार्य कर रही हैं।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि पराली जलाने से अगले सीजन की फसल उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ता है, इसके साथ ही पर्यावरण पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। पराली जलाने से CO2 और अन्य हानिकारक गैसों का उत्सर्जन होता है, जो ग्लोबल वॉर्मिंग को बढ़ावा देता है और मिट्टी की उर्वरता भी घट जाती है।
जिला प्रशासन और कृषि विभाग लगातार किसानों को पराली न जलाने के लिए जागरूक कर रहा है और इसके लिए जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है। पपीता रावत जैसे किसान दीदी न केवल खुद आत्मनिर्भर बन रही हैं, बल्कि उन्होंने समाज और कृषि क्षेत्र में भी सकारात्मक बदलाव लाने का काम किया है।






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