भोपाल, 24 अप्रैल
मध्य प्रदेश लंबे समय से देश में बाघों के प्रमुख ठिकाने के रूप में पहचाना जाता रहा है, जहां इनकी संख्या 1000 से अधिक मानी जा रही है। लेकिन अब इनके संरक्षण और प्रबंधन को लेकर वन विभाग के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है। स्थिति यह है कि अब बाघों की संख्या बढ़ाने से ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह बन गया है कि पारिस्थितिक संतुलन को बिगाड़े बिना कितने बाघों को संभाला जा सकता है। कई वन्य अभ्यारण्य अपनी प्राकृतिक वहन क्षमता के करीब पहुंच चुके हैं, जिससे दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
इसी स्थिति को देखते हुए मध्य प्रदेश वन विभाग ने अपने राष्ट्रीय उद्यानों और अभ्यारणों में बाघों की आवास क्षमता के वैज्ञानिक आकलन के लिए देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान से सहयोग मांगा है। विभाग का उद्देश्य यह जानना है कि प्रत्येक क्षेत्र में कितने बाघ सुरक्षित रूप से रह सकते हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार जनवरी 2025 से अब तक प्रदेश में लगभग 79 बाघों की मृत्यु हो चुकी है, जिनमें अधिकांश मामले आपसी क्षेत्रीय संघर्ष से जुड़े हुए पाए गए हैं। इस पर वन विभाग प्रमुख ने कहा है कि बढ़ती बाघ संख्या के कारण टकराव की घटनाएं बढ़ रही हैं और कई मौतें इसी वजह से हुई हैं। साथ ही यह भी बताया गया कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस बात पर जोर दिया है कि प्रत्येक अभ्यारण्य की क्षमता तय करने के लिए वैज्ञानिक मानकों की तत्काल आवश्यकता है, क्योंकि कम या अधिक संख्या दोनों ही स्थिति में जोखिम उत्पन्न करती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कई अभ्यारण्य पहले से ही अपने शिकार आधारित संसाधनों की सीमा के करीब पहुंच चुके हैं, हालांकि कुछ क्षेत्रों में अभी और बाघों को सहारा देने की क्षमता बनी हुई है। पूर्व शोध रिपोर्टों में भी यह संकेत दिया गया है कि कुछ अभ्यारण्य अपनी क्षमता के निकट हैं, जबकि कुछ में विस्तार की संभावना शेष है।
बढ़ती बाघ आबादी के कारण वन्यजीव अब संरक्षित क्षेत्रों से बाहर निकलकर मानव बस्तियों की ओर बढ़ने लगे हैं, जिससे संघर्ष की स्थिति पैदा हो रही है। कई वन्य गलियारे पहले ही बाधित हो चुके हैं, जिसके कारण भटके हुए बाघ बफर जोन और गांवों तक पहुंच रहे हैं। इससे मानव-वन्यजीव टकराव बढ़ने के साथ-साथ पारिस्थितिक दबाव भी लगातार बढ़ता जा रहा है।










