ओंकारेश्वर, 20 अप्रैल
मध्य प्रदेश के खंडवा जिले स्थित पवित्र नगरी ओंकारेश्वर में ओंकार पर्वत पर आयोजित पांच दिवसीय एकात्म पर्व के तीसरे दिन रविवार को अद्वैत दर्शन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का अनूठा संगम देखने को मिला। आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास और संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित इस आयोजन में देशभर से आए संतों और वक्ताओं की उपस्थिति में विशेष सत्र आयोजित किया गया।
21 अप्रैल तक चलने वाले इस पर्व के अंतर्गत आयोजित चर्चा में वक्ताओं ने अद्वैत दर्शन और आधुनिक तकनीक के संबंधों पर विचार रखे। सर्वम एआई के संस्थापक डॉ. प्रत्युष कुमार ने कहा कि भारत अपनी गहरी दार्शनिक परंपरा के कारण एआई को सकारात्मक दृष्टि से देखता है। उन्होंने कहा कि जहां विश्व के अन्य देश एआई से जुड़ी आशंकाओं में उलझे हैं, वहीं भारत इसे अवसर के रूप में देख रहा है।
उन्होंने बताया कि एआई एक समेकित प्रणाली के रूप में जटिल कार्यों को सरल बनाने की क्षमता रखता है। यदि इसे दार्शनिक मूल्यों के साथ जोड़ा जाए, तो इसका उपयोग अधिक नैतिक और मानव हितकारी बनाया जा सकता है। उनका मानना है कि आने वाले समय में एआई में मानवीय भावनाएं और संवाद क्षमता विकसित होने की संभावना भी है।

तकनीकी क्षेत्र में भारत की भूमिका पर चर्चा करते हुए उन्होंने माना कि बीते वर्षों में योगदान सीमित रहा है, लेकिन अद्वैत दर्शन के साथ समन्वय कर भविष्य में भारत वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ सकता है। आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर राहुल गर्ग ने भी कहा कि यदि युवाओं को अद्वैत की शिक्षा से जोड़ा जाए, तो ऐसे नवाचार विकसित हो सकते हैं जो तकनीक को मूल्यों और एकता से जोड़ेंगे।
रामकृष्ण मिशन चेन्नई के स्वामी परम शिवानंद ने अपने ‘संस्कृति दर्शनम्’ प्रकल्प की जानकारी देते हुए बताया कि वे वेदांत और आधुनिक तकनीक के माध्यम से युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर कार्य कर रहे हैं। इस पहल के जरिए एआई और मिश्रित वास्तविकता के माध्यम से वेदांत को व्यवहारिक स्वरूप देने का प्रयास किया जा रहा है।
एकात्म पर्व के दौरान श्रौत इष्टि के वैदिक अनुष्ठानों ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया है। श्रृंगेरी से आए आचार्य प्रतिदिन मंत्रोच्चार, यज्ञ और वेद पारायण कर रहे हैं। श्रौत इष्टि को वेदों में श्रेष्ठ कर्म माना गया है, जिसमें अग्नि में आहुति देकर ब्रह्मांडीय संतुलन और देव-मानव संबंधों को संतुलित करने का प्रयास किया जाता है। इसे आत्मिक शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है।
नर्मदा तट पर आयोजित इस पर्व में आध्यात्मिकता और कला का भी अद्भुत समागम देखने को मिला। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने आदि गुरु शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन और उनकी रचनाओं को जीवंत रूप में प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।









