पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले दलित समुदाय को साधने और सामाजिक समरसता बढ़ाने के लिए संघ और भाजपा ने लंबी रणनीति तैयार की है। चुनावी तैयारियों में दलित वोट निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
07 अप्रैल।
पंजाब में आगामी विधानसभा चुनाव भले ही लगभग एक वर्ष दूर हों, लेकिन राज्य की राजनीति अभी से पूरी तरह सक्रिय हो चुकी है। प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी रणनीतियों को धार देना शुरू कर दिया है। कांग्रेस अपने पुराने सहयोगियों को सक्रिय करने में जुटी है, वहीं आरएसएस ने “पंजाब विजन प्लान” के तहत जमीनी स्तर पर काम तेज कर दिया है। दूसरी ओर, भाजपा ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि वह राज्य की सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।
संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत का हालिया पंजाब दौरा इस संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 24 से 26 फरवरी तक चले इस दौरे के दौरान उन्होंने पिछले चार वर्षों के कार्यों की समीक्षा की और स्वयंसेवकों की रणनीति में आवश्यक बदलाव किए। संघ की कार्यप्रणाली अल्पकालिक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक होती है। इसी के तहत पिछले चार वर्षों से पंजाब के गांव-गांव में संगठनात्मक ढांचा मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है।
संघ का मानना है कि चुनावी वर्ष में केवल प्रचार से सफलता नहीं मिलती, बल्कि सामाजिक आधार मजबूत होना आवश्यक है। यही कारण है कि अब स्वयंसेवकों की सक्रियता पहले से अधिक बढ़ी हुई नजर आ रही है।
पंजाब की राजनीति में दलित समुदाय की भूमिका बेहद अहम है। राज्य में लगभग 38 से 40 प्रतिशत आबादी दलितों की है, जो इसे देश के उन राज्यों में शामिल करती है जहां दलित वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए संघ और भाजपा ने दलित समुदाय को साधने के लिए पांच बिंदुओं पर आधारित रणनीति तैयार की है।
संघ के पदाधिकारी और कार्यकर्ता पारंपरिक राजनीतिक तरीकों से अलग काम करते हैं। वे सीधे समाज के भीतर जाकर सामाजिक समरसता और आत्मसम्मान के मुद्दों पर काम कर रहे हैं। धर्म जागरण मंच के माध्यम से दलितों को उनकी जड़ों से जोड़ने, भेदभाव खत्म करने और हिंदू धर्म के प्रति आस्था बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
संघ द्वारा चलाए जा रहे “समरसता अभियान” के तहत गांवों में जातिगत भेदभाव को खत्म करने पर जोर दिया जा रहा है। योजना के अनुसार, आने वाले एक वर्ष में कई गांवों को “मॉडल गांव” के रूप में विकसित किया जाएगा, जहां एक ही श्मशान, योग केंद्र और जिम जैसी सुविधाएं होंगी। इसका उद्देश्य सभी जातियों के लोगों को एक साथ लाकर सामाजिक दूरी कम करना है।
यह पहल केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य सामाजिक ढांचे में गहरे बदलाव लाना है। दलित समुदाय को यह महसूस कराना कि वे समाज की मुख्यधारा का अभिन्न हिस्सा हैं, इस रणनीति का प्रमुख लक्ष्य है।
पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में से 34 सीटें आरक्षित हैं, जहां दलित मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा, 23 सीटें ऐसी हैं जहां दलितों का प्रभाव अत्यधिक है। खासकर मालवा क्षेत्र, जो 69 सीटों के साथ राज्य का सबसे बड़ा क्षेत्र है, वहां दलित आबादी 31 से 42 प्रतिशत तक है।
भाजपा के लिए यह क्षेत्र बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां मजबूत पकड़ बनाकर ही वह राज्य में अपनी स्थिति मजबूत कर सकती है। वर्तमान में आप, कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिल रहा है, जबकि भीम आर्मी भी धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रही है।
पंजाब में धार्मिक और जातिगत विभाजन एक जटिल मुद्दा रहा है। मंदिर और गुरुद्वारे अलग-अलग सामाजिक वर्गों के प्रतीक बन गए हैं। कई बार यह आरोप भी सामने आते हैं कि दलितों को बराबरी का अधिकार नहीं मिलता, हालांकि इन दावों की सच्चाई अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकती है।
संघ और उससे जुड़े संगठनों का प्रयास है कि इस विभाजन को खत्म किया जाए और सभी समुदायों को एक साथ लाया जाए। विशेष रूप से मंदिरों में दलितों की भागीदारी बढ़ाने और धार्मिक आस्था को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।
अमृतसर में स्थित राम तीर्थ स्थल का नाम बदलकर वाल्मीकि तीर्थ स्थल करना भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। यह स्थान महर्षि वाल्मीकि से जुड़ा हुआ है, जहां माता सीता ने वनवास के दौरान समय बिताया था।
इस ऐतिहासिक और धार्मिक संदर्भ को सामने लाकर दलित समुदाय को सम्मान और गौरव का एहसास दिलाने की कोशिश की जा रही है। यह कदम न केवल सांस्कृतिक पुनर्स्थापन का प्रयास है, बल्कि सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण पहल है।
पंजाब में आगामी चुनाव केवल राजनीतिक दलों के बीच सत्ता की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह सामाजिक आधार को मजबूत करने की भी जंग है। भाजपा और संघ जहां दीर्घकालिक सामाजिक रणनीति पर काम कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भी अपने-अपने स्तर पर वोट बैंक को साधने में जुटी हैं।
दलित समुदाय इस पूरे समीकरण का केंद्र बन चुका है। जो भी दल इस वर्ग का विश्वास जीतने में सफल होगा, वही सत्ता के करीब पहुंच सकता है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सामाजिक समरसता, धार्मिक पहचान और राजनीतिक रणनीतियों का यह मिश्रण पंजाब की राजनीति को किस तरह प्रभावित करता है।