उत्तर प्रदेश
11 May, 2026

राजकीय अभिलेखागार के 77वें स्थापना दिवस पर लखनऊ में राष्ट्रीय संगोष्ठी और प्रदर्शनी का आयोजन

लखनऊ में उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार के 77वें स्थापना दिवस पर पांडुलिपियों और भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व पर राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं प्रदर्शनी का आयोजन किया जाएगा, जिसमें विभिन्न विश्वविद्यालयों के विद्वान अपने विचार साझा करेंगे।

लखनऊ, 11 मई।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार अपना 77वां स्थापना दिवस मनाने जा रहा है। इस अवसर पर 13 मई को लखनऊ स्थित शहीद स्मृति भवन में “भारतीय ज्ञान परंपरा में पांडुलिपियों का महत्व एवं भावी पीढ़ी के लिए उपयोगिता” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी और अभिलेख प्रदर्शनी का आयोजन किया जाएगा, जिसमें इतिहास और संस्कृति से जुड़े कई विद्वान अपने विचार प्रस्तुत करेंगे।

इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजय तनेजा शामिल होंगे, वहीं विशिष्ट अतिथि के रूप में शकुन्तला मिश्रा पुनर्वास विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त अधिष्ठाता प्रो. अविनाश चन्द्र मिश्रा उपस्थित रहेंगे। संगोष्ठी में विभिन्न विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञ पांडुलिपियों, अभिलेखों और भारतीय ज्ञान परंपरा पर विस्तार से अपने व्याख्यान देंगे।

कार्यक्रम के पहले सत्र में पाली एवं बौद्ध अध्ययन, राजनीति विज्ञान और इतिहास के विशेषज्ञ भारतीय ज्ञान परंपरा तथा पांडुलिपियों के महत्व पर विचार रखेंगे। वहीं दूसरे सत्र में प्राचीन इतिहास, संस्कृत और आधुनिक इतिहास के विद्वान अभिलेख संरक्षण और शोध में उनकी उपयोगिता पर अपने विचार साझा करेंगे। कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र भी प्रदान किए जाएंगे।

पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार की स्थापना 2 मई 1949 को इलाहाबाद में केंद्रीय अभिलेख कार्यालय के रूप में की गई थी, जिसे वर्ष 1973 में लखनऊ स्थित स्थायी भवन में स्थानांतरित किया गया। वर्तमान में यह संस्था संस्कृति विभाग के अंतर्गत कार्य करते हुए प्रदेश की अभिलेखीय धरोहर के संरक्षण और उपयोग की दिशा में निरंतर प्रयासरत है।

उन्होंने यह भी बताया कि अभिलेखागार का प्रमुख उद्देश्य प्रदेश के विभिन्न विभागों और जिला कार्यालयों में संरक्षित ऐतिहासिक अभिलेखों का संरक्षण कर उन्हें शोध और जनहित के लिए उपयोगी बनाना है। इसके अंतर्गत 30 वर्ष से अधिक पुराने महत्वपूर्ण अभिलेखों का संग्रह, वैज्ञानिक संरक्षण, सूचीकरण तथा शोधार्थियों को आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, साथ ही दुर्लभ पांडुलिपियों और दस्तावेजों के संरक्षण का कार्य भी किया जाता है।

इसके अलावा अभिलेखों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए समय-समय पर प्रदर्शनियों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिससे नई पीढ़ी को अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत तथा भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान मिल रहा है।

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