संपादकीय
30 Mar, 2026

सड़कों से गायब हुए फुटपाथ: अतिक्रमण और प्रशासनिक उदासीनता की कहानी

भारत के शहरों में फुटपाथों का गायब होना पैदल यात्रियों की सुरक्षा और सामाजिक न्याय के लिए गंभीर चुनौती बन गया है।

डॉ. शैलेश शुक्ला

भारत के शहरों में फुटपाथों का गायब होना आज एक गंभीर शहरी संकट बन चुका है। यह समस्या अचानक नहीं उत्पन्न हुई, बल्कि वर्षों की उपेक्षा, कमजोर शहरी नियोजन और प्रशासनिक निष्क्रियता का परिणाम है। उपलब्ध सरकारी रिपोर्टों और अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि पैदल यात्रियों की सुरक्षा को लगातार नजरअंदाज किया गया है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की रिपोर्ट “रोड एक्सीडेंट इन इंडिया 2022” बताती है कि सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली कुल मौतों में लगभग 19 प्रतिशत पैदल यात्रियों की हिस्सेदारी है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि हर पाँच में से एक व्यक्ति, जो सड़क पर अपनी जान गंवाता है, वह पैदल चल रहा होता है।

भारतीय शहरों में पैदल यात्रियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। विभिन्न अध्ययनों, विशेष रूप से “नेशनल अर्बन ट्रांसपोर्ट पॉलिसी 2006” में यह स्वीकार किया गया है कि 20 से 40 प्रतिशत यात्राएँ छोटी दूरी की होती हैं, जिन्हें लोग पैदल या गैर-मोटर चालित साधनों से पूरा करते हैं। इसके बावजूद, शहरी सड़कें मुख्यतः मोटर वाहनों के लिए डिजाइन की जाती हैं। इस नीति और व्यवहार के अंतर ने फुटपाथों को अनिवार्य के बजाय वैकल्पिक बना दिया है। परिणामस्वरूप, अधिकांश शहरों में या तो फुटपाथ मौजूद ही नहीं हैं या वे इतने संकरे और अव्यवस्थित हैं कि उनका उपयोग करना जोखिम भरा हो जाता है।

फुटपाथों पर अतिक्रमण इस समस्या को और गंभीर बनाता है। शहरी क्षेत्रों में फुटपाथ अक्सर रेहड़ी-पटरी, अस्थायी दुकानों, अवैध पार्किंग और निर्माण सामग्री से घिरे रहते हैं। कई स्थानों पर स्थायी संरचनाएँ तक खड़ी कर दी जाती हैं। यह स्थिति केवल अवैधता का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह शहरी नियोजन और अर्थव्यवस्था के बीच असंतुलन को भी दर्शाती है। “स्ट्रीट वेंडर्स (प्रोटेक्शन ऑफ लाइवलीहुड एंड रेगुलेशन ऑफ स्ट्रीट वेंडिंग) एक्ट 2014” का उद्देश्य था कि वेंडर्स को व्यवस्थित स्थान प्रदान कर उनकी आजीविका सुरक्षित रखी जाए और सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण को नियंत्रित किया जाए। लेकिन जमीनी स्तर पर इस कानून का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पाया है। टाउन वेंडिंग कमेटियाँ कई शहरों में निष्क्रिय हैं और पर्याप्त वेंडिंग जोन विकसित नहीं किए गए हैं।

प्रशासनिक दृष्टि से यह समस्या और भी जटिल हो जाती है। नगर निगमों और विकास प्राधिकरणों के पास अतिक्रमण हटाने के अधिकार तो हैं, लेकिन उनकी कार्रवाई अक्सर असंगत और अस्थायी होती है। समय-समय पर चलाए जाने वाले अभियान कुछ दिनों के लिए स्थिति सुधारते हैं, लेकिन स्थायी समाधान नहीं दे पाते। इसका प्रमुख कारण राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और स्थानीय स्तर पर होने वाला विरोध है। साथ ही, विभिन्न विभागों—जैसे यातायात, नगर नियोजन और पुलिस—के बीच समन्वय का अभाव भी समस्या को बढ़ाता है।

फुटपाथों की गुणवत्ता और डिजाइन भी चिंताजनक है। भारतीय सड़क कांग्रेस के दिशानिर्देशों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि फुटपाथ पर्याप्त चौड़े, समतल और बाधा-रहित होने चाहिए, ताकि सभी लोग, विशेषकर दिव्यांगजन, उनका उपयोग आसानी से कर सकें। लेकिन वास्तविकता में फुटपाथ कहीं टूटे हुए, कहीं ऊँच-नीच वाले और कहीं अवरोधों से भरे होते हैं। इससे पैदल यात्रियों को सड़क पर चलने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।

यह समस्या सामाजिक न्याय से भी जुड़ी हुई है। पैदल चलने वाले लोग प्रायः समाज के कमजोर वर्गों से आते हैं—जैसे मजदूर, छात्र, बुजुर्ग और महिलाएँ। जब फुटपाथ सुरक्षित नहीं होते, तो सबसे अधिक नुकसान इन्हीं वर्गों को उठाना पड़ता है। इस दृष्टि से फुटपाथों का अभाव केवल भौतिक समस्या नहीं, बल्कि शहरी असमानता का प्रतीक है।

अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताते हैं कि यदि पैदल यात्रियों को प्राथमिकता दी जाए, तो शहरों की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है। जिन शहरों ने पैदल और साइकिल आधारित परिवहन को बढ़ावा दिया है, वहाँ दुर्घटनाओं में कमी, प्रदूषण में गिरावट और ट्रैफिक जाम में राहत देखी गई है। इसके विपरीत, भारत में अब भी वाहन-केंद्रित विकास मॉडल को प्राथमिकता दी जाती है, जिसमें फुटपाथों को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

समाधान के लिए सबसे जरूरी है कि दृष्टिकोण में बदलाव लाया जाए। फुटपाथों को पूरक नहीं, बल्कि प्राथमिक अवसंरचना के रूप में देखा जाना चाहिए। हर नई सड़क परियोजना में फुटपाथ अनिवार्य हों और उनके लिए अलग बजट निर्धारित किया जाए। अतिक्रमण की समस्या के समाधान के लिए केवल दमनात्मक कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि वेंडर्स के लिए वैकल्पिक और व्यवस्थित स्थान उपलब्ध कराना भी आवश्यक है।

फुटपाथों का मुद्दा केवल यातायात या शहरी नियोजन का नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों और गरिमा से जुड़ा हुआ है। जब कोई व्यक्ति अपने ही शहर में सुरक्षित रूप से पैदल नहीं चल सकता, तो यह शासन की विफलता को दर्शाता है। यदि भारत को वास्तव में समावेशी और सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ना है, तो फुटपाथों की वापसी को प्राथमिकता देनी होगी। यही कदम शहरों को अधिक सुरक्षित, समान और मानवीय बनाने की दिशा में पहला कदम होगा।

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