भारत ने सिंधु जल से जुड़े मध्यस्थता न्यायालय के हालिया फैसले को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि इस न्यायाधिकरण को देश कभी मान्यता ही नहीं देता, इसलिए इसके किसी भी आदेश या निर्णय का कोई कानूनी महत्व नहीं है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का निर्णय अभी भी प्रभावी है।
विदेश मंत्रालय के अनुसार 15 मई को तथाकथित रूप से गठित मध्यस्थता न्यायालय ने सिंधु जल संधि की व्याख्या से जुड़े मामले में एक अतिरिक्त निर्णय जारी किया था, जो जल भंडारण से संबंधित मुद्दों पर आधारित था। भारत ने इस निर्णय को भी पूर्व के सभी आदेशों की तरह पूरी तरह अस्वीकार कर दिया है।
मंत्रालय ने कहा कि भारत ने इस कथित न्यायाधिकरण की स्थापना को कभी स्वीकार नहीं किया और इसकी कार्यवाही को भी वैध नहीं माना गया है। ऐसे में इसके सभी निर्णयों को अमान्य माना जाता है।
उल्लेखनीय है कि भारत ने अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला लिया था। यह संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी।
इस संधि के तहत पूर्वी नदियों रावी, व्यास और सतलज का जल भारत के उपयोग के लिए निर्धारित किया गया था, जबकि पश्चिमी नदियों सिंधु, झेलम और चिनाब का जल पाकिस्तान को आवंटित किया गया था।










