नई दिल्ली, 12 जून।
पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) की फिजा में इन दिनों सिर्फ एक ही नारा गूंज रहा है - "हमें इंसाफ चाहिए।" जेएएससी यानी ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी के आह्वान पर पूरे इलाके में बाजार बंद हैं, सड़कें सूनी हैं और सरकार के खिलाफ गुस्सा चरम पर है। मुजफ्फराबाद से लेकर कोटली और रावलाकोट तक दुकानों के शटर गिरे हैं, परिवहन ठप है और आम आदमी हाथ में तिरंगा नहीं, बल्कि रोटी, कपड़ा और मकान की मांग वाली तख्तियां लेकर सड़कों पर है। पाकिस्तान दुनिया के मंचों पर कश्मीर का राग अलापता है, लेकिन अपने ही कब्जे वाले हिस्से में आवाम की आवाज बूटों से कुचल रहा है। पीओजेके आज "आजाद कश्मीर" नहीं, बल्कि "बेबस कश्मीर" बन चुका है।
1947 में कबायली हमलावरों की आड़ में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के इस हिस्से पर अवैध कब्जा किया और नाम दिया "आजाद जम्मू-कश्मीर", लेकिन 75 वर्षों में आजादी के नाम पर वहां की जनता को केवल गुलामी मिली। मंगला डैम से लेकर नीलम-झेलम हाइड्रो प्रोजेक्ट तक बिजली पीओजेके में बनती है, लेकिन रोशनी लाहौर और इस्लामाबाद को मिलती है। पीओजेके के शहर 18 से 20 घंटे अंधेरे में डूबे रहते हैं। आटा 200 रुपये किलो, बिजली का बिल 30 से 40 हजार रुपये प्रतिमाह, बेरोजगारी 50 प्रतिशत से अधिक और ऊपर से नए-नए करों का बोझ। स्कूल और अस्पताल बदहाल हैं, सड़कें गड्ढों में तब्दील हैं। जनता पूछ रही है - हमारा पानी, हमारी बिजली और हमारी जमीन पर हक पाकिस्तान का क्यों?
जेएएससी का आंदोलन इसी आर्थिक भेदभाव के खिलाफ है। 11 मई 2024 को मुजफ्फराबाद में पुलिस फायरिंग में चार युवकों की मौत के बाद यह चिंगारी शोले में बदल गई। अब मांग सिर्फ बिजली बिल में राहत की नहीं है, बल्कि लोग कह रहे हैं - हमें सब्सिडी नहीं, हमारा अधिकार चाहिए। 1947 के समझौतों के अनुरूप स्वायत्तता चाहिए।
पीओजेके के प्रदर्शनकारियों के बीच एक नारा बार-बार सुनाई देता है - "देखो उधर का कश्मीर।" अनुच्छेद 370 हटने के बाद भारत का जम्मू-कश्मीर तेजी से बदल रहा है। निवेश बढ़ा है, पर्यटन नए रिकॉर्ड बना रहा है, आधारभूत ढांचे का विस्तार हुआ है और विकास की नई संभावनाएं खुली हैं। दूसरी ओर पीओजेके में न निवेश है, न पर्यटन, न स्थिरता। वहां केवल सेना, आईएसआई और आतंकवादी ढांचे की मौजूदगी दिखाई देती है। भारत में जी-20 जैसे अंतरराष्ट्रीय आयोजन होते हैं, जबकि पीओजेके में लोग आटे और बिजली के लिए संघर्ष कर रहे हैं। एक ओर लोकतंत्र है, दूसरी ओर सैन्य नियंत्रण।
इस्लामाबाद दशकों से "कश्मीर बनेगा पाकिस्तान" का नारा देता रहा, लेकिन आज पीओजेके के लोग कह रहे हैं - पहले पीओजेके को तो पाकिस्तान जैसा बना दो। पाकिस्तान के पंजाब में मोटरवे हैं, जबकि पीओजेके में टूटी सड़कें हैं। लाहौर में मेट्रो है, लेकिन मुजफ्फराबाद में घंटों बिजली गुल रहती है। पाकिस्तानी सेना के लिए पीओजेके केवल एक रणनीतिक बफर है। यहां के लोगों को नागरिक नहीं, बल्कि सामरिक संसाधन समझा गया। बांध बने, लेकिन रॉयल्टी नहीं मिली; खनिज निकाले गए, लेकिन रोजगार नहीं मिला। अब जब जनता हिसाब मांग रही है, तो जवाब में रेंजर, अर्धसैनिक बल और गोलियां मिल रही हैं।
इसी बीच भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने जम्मू-कश्मीर में उत्तरी कमान का दौरा कर स्पष्ट संकेत दिया है कि भारत हर गतिविधि पर नजर रखे हुए है। महत्वपूर्ण यह है कि भारत ने कोई उकसाने वाली कार्रवाई नहीं की, बल्कि पीओजेके की जनता ने स्वयं पाकिस्तान की नीतियों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जो पाकिस्तान दुनिया से कहता था कि कश्मीरी भारत से आजादी चाहते हैं, आज उसी के कब्जे वाले क्षेत्र के लोग पाकिस्तान से आजादी और अधिकारों की मांग कर रहे हैं।
आगे की तस्वीर तीन संभावनाएं दिखाती है। पहली, पाकिस्तान बल प्रयोग से आंदोलन दबाने का प्रयास करेगा, लेकिन भूख और अपमान की आग लंबे समय तक दबाई नहीं जा सकती। दूसरी, आर्थिक पैकेज और सब्सिडी का प्रलोभन दिया जाएगा, जबकि जनता अब अस्थायी राहत नहीं, स्थायी अधिकार चाहती है। तीसरी, भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पीओजेके में मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों का मुद्दा और मजबूती से उठा सकता है।
सबसे बड़ा विडंबना यह है कि जिस क्षेत्र का नाम "आजाद जम्मू-कश्मीर" रखा गया, वहां न आजादी है, न जम्मू है और न कश्मीरियत। वहां है तो केवल पाकिस्तान की सैन्य मौजूदगी, चीन का कर्ज और आम जनता की लाचारी। जेएएससी का आंदोलन इस बात का संकेत है कि बंदूक की नोक पर लिखी गई इबारतें हमेशा कायम नहीं रहतीं। पाकिस्तान ने जिस कश्मीर को जन्नत बताया, उसी हिस्से को उसने अपने शासन में जहन्नुम बना दिया है। पीओजेके की सड़कें आज सिर्फ बाजार बंद होने से सूनी नहीं हैं, बल्कि इसलिए सूनी हैं क्योंकि वहां से इंसाफ, रोजगार और उम्मीद तीनों गायब हैं।
भारत के लिए यह अवसर केवल घटनाक्रम देखने का नहीं, बल्कि लोकतंत्र और सैन्य वर्चस्व के अंतर को दुनिया के सामने स्पष्ट करने का भी है। जब पीओजेके का आम नागरिक भारत जैसे अधिकारों की बात करता है, तो यह स्वयं एक बड़ा राजनीतिक संदेश बन जाता है। आखिर जिस पाकिस्तान से अपना कब्जे वाला हिस्सा नहीं संभल रहा, वह श्रीनगर के सपने किस आधार पर देखता है? पीओजेके की सड़कों पर गिरा हर आंसू इस्लामाबाद के दावों पर एक करारा तमाचा है, जिसकी गूंज रावलपिंडी से लेकर जिनेवा तक सुनाई दे रही है।















