नई दिल्ली, 13 जून।
कवि एवं भाषाविद प्रो. उदय नारायण सिंह 'नचिकेता' ने कहा है कि मैथिली रंगमंच को नई ऊर्जा देने और रंगकर्मियों का मनोबल बढ़ाने के लिए समाज को आगे आना होगा। उन्होंने सुझाव दिया कि उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले कलाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए पुरस्कार और सम्मान की परंपरा विकसित की जानी चाहिए।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में साहित्य अकादमी और मैथिली लोक रंग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 'मैथिली रंगमंच आंदोलन' विषयक एक दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए उन्होंने मैथिली रंगमंच की समृद्ध परंपरा और उसके विकासक्रम पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत में मैथिली रंगमंच का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। मैथिली साहित्य में ‘गोरक्ष विजय’ और ‘धूर्तसमागम’ जैसे महत्वपूर्ण नाट्य ग्रंथ पहले से मौजूद रहे हैं। प्रारंभिक दौर में अनुवाद आधारित नाटकों से शुरुआत हुई, लेकिन समय के साथ बड़ी संख्या में मौलिक नाटकों का सृजन हुआ, जिसने इस आंदोलन को नई दिशा प्रदान की।
वरिष्ठ रंगकर्मी प्रदीप बिहारी ने कहा कि विभिन्न चरणों से गुजरते हुए आज मैथिली रंगमंच का दायरा काफी व्यापक हो चुका है। उन्होंने समाज से कलाकारों को प्रोत्साहन देने और रंगकर्म से जुड़े लोगों के लिए विशेष सम्मान स्थापित करने की अपील की।
परिसंवाद के दौरान मैथिली रंगमंच के ऐतिहासिक विस्तार, सामाजिक प्रभाव और वर्तमान स्थिति पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कोलकाता, मिथिला और नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में रंगमंचीय गतिविधियों के योगदान को रेखांकित किया।
वरिष्ठ अभिनेत्री प्रेमलता मिश्र ने कहा कि पहले रंगमंच में महिलाओं की भागीदारी सीमित थी, लेकिन बदलते सामाजिक परिवेश के साथ बड़ी संख्या में महिला कलाकार और निर्देशिकाएं इस क्षेत्र में सक्रिय हुई हैं और नई उपलब्धियां हासिल कर रही हैं।
दूसरे सत्र में वैश्विक प्रभाव, आधुनिक नाट्य शैलियों और सामाजिक सरोकारों पर चर्चा की गई। समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. देवशंकर नवीन ने कहा कि साहित्य और रंगमंच केवल मनोरंजन के माध्यम नहीं हैं, बल्कि समाज को दिशा देने और परिवर्तन का संदेश पहुंचाने का सशक्त साधन भी हैं।















