संपादकीय
15 Jun, 2026

इथेनॉल की उड़ान तभी सफल होगी, जब नीति और तैयारी साथ चलें

पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की नीति भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे ले जा सकती है, लेकिन इसके लिए उद्योग, उपभोक्ताओं और आधारभूत ढांचे की व्यापक तैयारी आवश्यक होगी।

नई दिल्ली, 15 जून।

भारत ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की नीति इसी सोच का हिस्सा है। ई20 के सफल विस्तार के बाद अब ई85 ईंधन की शुरुआत और ई22, ई25, ई27 तथा ई30 जैसे मिश्रणों पर उत्पाद शुल्क में छूट यह संकेत देती है कि सरकार जैव ईंधन आधारित अर्थव्यवस्था को नई गति देना चाहती है। लेकिन हर बड़े बदलाव की तरह यहां भी सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या देश का परिवहन तंत्र, उद्योग और उपभोक्ता इस परिवर्तन के लिए तैयार हैं?

भारत अपनी पेट्रोलियम जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक संकट देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डालते हैं। ऐसे में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाना केवल पर्यावरणीय पहल नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और विदेशी मुद्रा बचाने की रणनीति भी है। इससे घरेलू डिस्टिलरी उद्योग को प्रोत्साहन मिलेगा और किसानों के लिए भी अतिरिक्त बाजार तैयार होगा। यह नीति ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने का माध्यम बन सकती है।

लेकिन नीति की सफलता केवल घोषणा से नहीं, बल्कि उसके व्यावहारिक क्रियान्वयन से तय होती है। वर्तमान में देश की अधिकांश गाड़ियां पारंपरिक पेट्रोल या अधिकतम ई20 मिश्रण के अनुरूप डिजाइन की गई हैं। ई85 जैसे उच्च इथेनॉल मिश्रण का उपयोग केवल फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों में संभव है। ऐसे वाहनों का उत्पादन बढ़ाने के लिए वाहन कंपनियों को इंजन, फ्यूल सिस्टम और अन्य तकनीकी हिस्सों में बड़े बदलाव करने होंगे। इसके लिए समय और भारी निवेश दोनों की आवश्यकता है। यदि सरकार बार-बार मिश्रण के लक्ष्य बदलती रही तो उद्योग के सामने अनिश्चितता और लागत दोनों बढ़ेंगी।

उपभोक्ताओं का हित भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होती है, इसलिए अधिक इथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन पर माइलेज घटने की आशंका रहती है। यदि प्रति लीटर कीमत कम हो लेकिन वाहन ज्यादा ईंधन खपत करे, तो आम उपभोक्ता को अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिलेगा। इसलिए केवल सस्ता ईंधन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि ऐसी मूल्य निर्धारण व्यवस्था बनानी होगी जिससे उपभोक्ता को वास्तविक बचत महसूस हो।

एक और गंभीर चुनौती इथेनॉल उत्पादन के स्रोत हैं। भारत में इथेनॉल का बड़ा हिस्सा गन्ने और उससे जुड़े उत्पादों से तैयार होता है। गन्ना अत्यधिक जल खपत वाली फसल है और देश के कई हिस्से पहले ही जल संकट का सामना कर रहे हैं। यदि उत्पादन बढ़ाने की होड़ में जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा तो ऊर्जा सुरक्षा की कीमत पर्यावरणीय संकट के रूप में चुकानी पड़ सकती है। इसलिए मक्का, कृषि अपशिष्ट और दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधन जैसे विकल्पों को भी समान प्राथमिकता देनी होगी।

भारत के लिए भविष्य केवल एक तकनीक पर निर्भर नहीं हो सकता। इलेक्ट्रिक वाहन, इथेनॉल, संपीड़ित बायोगैस और हरित हाइड्रोजन जैसे विकल्प मिलकर ही टिकाऊ परिवहन व्यवस्था का निर्माण करेंगे। बैटरी आधारित तकनीक जहां महत्वपूर्ण खनिजों पर निर्भर है, वहीं इथेनॉल और बायोगैस घरेलू संसाधनों से तैयार होकर आयात निर्भरता कम कर सकते हैं। इसलिए किसी एक विकल्प को अंतिम समाधान मानने के बजाय संतुलित और बहुआयामी रणनीति अपनाना अधिक व्यावहारिक होगा।

इथेनॉल भारत के ऊर्जा भविष्य का महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकता है, लेकिन इसके लिए स्पष्ट दीर्घकालिक रोडमैप, स्थिर नीति, पर्याप्त आधारभूत ढांचा और उद्योग के साथ निरंतर संवाद आवश्यक है। जल्दबाजी में लक्ष्य बदलने के बजाय सरकार को ऐसी परिवहन नीति तैयार करनी होगी जो अगले दो-तीन दशकों की जरूरतों को ध्यान में रखे। ऊर्जा आत्मनिर्भरता का सपना तभी साकार होगा, जब नीति की महत्वाकांक्षा और जमीनी तैयारी एक ही दिशा में आगे बढ़ें।

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