संपादकीय
15 Jun, 2026

2030 में इतिहास बन जाएगी अंतरिक्ष की सबसे बड़ी प्रयोगशाला: आईएसएस की प्रशांत महासागर में समाधि, पीछे छूटेगी 25 साल की विरासत और नए सवा

आईएसएस (इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन) को वर्ष 2030 तक सेवा से हटाकर प्रशांत महासागर के दूरस्थ क्षेत्र पॉइंट नीमो में नियंत्रित तरीके से गिराया जाएगा। 25 वर्षों तक अंतरिक्ष अनुसंधान और वैश्विक वैज्ञानिक सहयोग का केंद्र रहे इस स्टेशन की विदाई के साथ अंतरिक्ष इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त होगा और निजी स्पेस स्टेशनों तथा भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों का नया दौर शुरू होगा।

वॉशिंगटन, 15 जून।

पृथ्वी से 400 किलोमीटर ऊपर बीते 25 सालों से लगातार चक्कर लगा रहा इंसान का सबसे बड़ा अंतरिक्ष घर अब अपने अंतिम दौर में है। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आईएसएस) को 2030 तक रिटायर कर प्रशांत महासागर के पॉइंट नीमो नाम के सबसे दूरस्थ हिस्से में गिरा दिया जाएगा। नासा ने इसकी आधिकारिक पुष्टि कर दी है। 1.5 लाख किलो वजन और फुटबॉल मैदान जितने बड़े इस ढांचे का अंत अंतरिक्ष युग के एक अध्याय का अंत होगा।

आईएसएस का गिरना दुखद है, परंतु जरूरी भी है। कोई भी मशीन अमर नहीं होती। 25 साल में इसने हमें सिखाया कि साथ मिलकर नामुमकिन को मुमकिन बनाया जा सकता है। इसने युद्ध के दौर में भी शांति का पुल बनाया। 2030 में जब आईएसएस का आखिरी टुकड़ा प्रशांत महासागर में समाएगा, तो वह असफलता का प्रतीक नहीं होगा, बल्कि इस बात का सबूत होगा कि इंसान ने धरती की सीमा छोड़कर तारों के बीच घर बनाया था और अब वह उस घर से निकलकर चांद, मंगल और उससे आगे की बस्तियां बसाने जा रहा है। आईएसएस जा रहा है, परंतु उसने जो रास्ता दिखाया है, उस पर अब पूरी दुनिया चल पड़ी है। भारत को भी उस दौड़ में सबसे आगे होना है, क्योंकि अंतरिक्ष अब सिर्फ रोमांच नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और भविष्य का भी विषय है।

आईएसएस कोई एक देश की उपलब्धि नहीं है। यह 15 देशों का साझा सपना है। अमेरिका, रूस, जापान, कनाडा और यूरोपीय स्पेस एजेंसी ने मिलकर इसे 1998 में बनाना शुरू किया। पहला मॉड्यूल 'जारिया' रूस ने भेजा, फिर अमेरिका का 'यूनिटी' मॉड्यूल उससे जुड़ा। 2000 में पहली बार तीन अंतरिक्ष यात्री इसमें रहने गए। तब से आज तक यह एक भी दिन खाली नहीं रहा। 6 से 8 अंतरिक्ष यात्री हर समय इसमें मौजूद रहते हैं। अब तक 19 देशों के 270 से ज्यादा यात्री यहां रह चुके हैं। इन्होंने 3,300 से ज्यादा वैज्ञानिक प्रयोग किए। कैंसर की दवा से लेकर जल शुद्धिकरण तक और पौधों के उगने से लेकर हड्डियों के घनत्व तक हजारों खोजों ने धरती पर हमारी जिंदगी बदली। आईएसएस ने साबित किया कि दुश्मन देश भी विज्ञान के लिए साथ आ सकते हैं। अमेरिका-रूस के तनाव के बावजूद दोनों ने स्टेशन को चालू रखा।

आईएसएस को 15 साल के लिए डिजाइन किया गया था, परंतु यह 25 साल तक चल चुका है। अब इसकी हालत खराब हो रही है। दीवारों में छोटी दरारें, हवा रिसने की घटनाएं, सोलर पैनलों की क्षमता घटना और कंप्यूटर सिस्टम का पुराना पड़ना अब सामान्य बात हो गई है। नासा का अनुमान है कि 2030 के बाद इसे चलाना बेहद खतरनाक और महंगा हो जाएगा। रखरखाव का सालाना खर्च 4.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। 2028 के बाद रूस भी अपने मॉड्यूल अलग कर लेगा। इसलिए सभी साझेदार देशों ने मिलकर इसे नियंत्रित तरीके से गिराने का फैसला किया है।

इसे ऐसे ही नहीं छोड़ा जा सकता। अगर नियंत्रण खो गया, तो 420 टन का मलबा कहीं भी गिर सकता है। इसलिए स्पेसएक्स का एक विशेष ड्रैगन यान आईएसएस को धक्का देकर पृथ्वी के वायुमंडल में लाएगा। इसका ज्यादातर हिस्सा जल जाएगा और बचा हुआ मलबा पॉइंट नीमो में गिराया जाएगा। यह प्रशांत महासागर का वह हिस्सा है, जो आबादी से सबसे दूर है। इसे 'स्पेसक्राफ्ट कब्रिस्तान' भी कहा जाता है। 1971 से अब तक 260 से ज्यादा सैटेलाइट और अंतरिक्ष स्टेशन यहां दफन हो चुके हैं।

आईएसएस पर लगभग 9500 करोड़ रुपये खर्च हुए, परंतु इसने जो लौटाया उसकी कीमत लगाना मुश्किल है। माइक्रोग्रैविटी में प्रोटीन क्रिस्टल उगाकर अल्जाइमर और पार्किंसन की नई दवाओं के विकास में मदद मिली। अंतरिक्ष में शरीर कैसे बदलता है, यह समझकर उम्र बढ़ने की प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण शोध हुए। पानी को 98 प्रतिशत तक रीसाइकिल करने वाली तकनीक आईएसएस से आई। आज वही प्रणाली सूखाग्रस्त इलाकों में काम आ रही है। हवा साफ करने वाले फिल्टर, रोबोटिक हाथ तथा हल्के लेकिन मजबूत मटेरियल जैसी कई तकनीकें आईएसएस की देन हैं। शीत युद्ध के दुश्मन रहे अमेरिका और रूस ने 25 साल तक कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। इससे यह साबित हुआ कि अंतरिक्ष में कोई सीमा नहीं होती। आईएसएस से अंतरिक्ष यात्रियों ने लाखों बच्चों से सीधी बातचीत की। पृथ्वी कितनी नाजुक दिखती है, यह संदेश देकर उन्होंने पूरी पीढ़ी को पर्यावरण के प्रति जागरूक किया।

आईएसएस का जाना एक युग का अंत है, परंतु अंतरिक्ष में इंसान की मौजूदगी का नहीं। नासा अब खुद स्टेशन नहीं बनाएगा, बल्कि 'किराए पर स्टेशन' लेगा। एक्सिओम स्पेस, ब्लू ओरिजिन और नैनोरैक्स जैसी निजी कंपनियां 2028 से 2030 के बीच अपने स्पेस स्टेशन लॉन्च करने की तैयारी में हैं। भारत भी पीछे नहीं है। इसरो 2035 तक अपना भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन बनाने की तैयारी कर रहा है। 2025 में गगनयान मिशन के तहत भारतीय यात्री अंतरिक्ष जाएंगे। रूस और चीन मिलकर आईएलआरएस नाम का मून बेस बना रहे हैं। यानी भविष्य एक बड़े स्टेशन का नहीं, बल्कि कई छोटे स्टेशनों का है।

आईएसएस में भारत सीधा साझेदार नहीं था, परंतु हमारे वैज्ञानिकों ने इसके डेटा का इस्तेमाल किया। 2023 में राकेश शर्मा के बाद भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला एक्सिओम-4 मिशन से आईएसएस गए। उन्होंने वहां मेथी और मूंग उगाने का प्रयोग किया। 2030 में जब आईएसएस गिरेगा, तो लो-अर्थ ऑर्बिट में एक खालीपन आएगा। भारत के पास अवसर है कि वह अपने अंतरिक्ष स्टेशन से उस जगह को भरे। इसके लिए जरूरी है कि हम स्पेस बजट बढ़ाएं, निजी कंपनियों को जोड़ें और गगनयान मिशन को समय पर पूरा करें।

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