भोपाल, 15 जून।
एक समय था जब बच्चों की हँसी खेल के मैदानों में गूंजती थी, परिवारों में संवाद होते थे और खाली समय रचनात्मक गतिविधियों में बीतता था। आज स्थिति तेजी से बदल रही है। घरों, स्कूलों, बाजारों और सार्वजनिक स्थानों पर हर आयु वर्ग के हाथ में मोबाइल दिखाई देता है। तकनीक ने जीवन को सरल बनाया है, लेकिन इसकी बढ़ती निर्भरता अब एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक चुनौती का रूप लेती जा रही है।
मोबाइल फोन आज केवल संचार का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि कई लोगों के लिए तनाव से बचने, अकेलेपन को भरने और वास्तविक जीवन की समस्याओं से पलायन का साधन बनता जा रहा है। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि इस डिजिटल निर्भरता का प्रभाव बच्चों और किशोरों पर गहराई से दिखाई दे रहा है।
आज अनेक परिवारों में रोते हुए बच्चे को शांत कराने, भोजन कराने या कुछ समय के लिए व्यस्त रखने हेतु मोबाइल थमा देना एक सामान्य व्यवहार बन चुका है। माता-पिता की व्यस्त दिनचर्या में यह आसान समाधान प्रतीत होता है, लेकिन यही सुविधा धीरे-धीरे एक मनोवैज्ञानिक निर्भरता का आधार बन सकती है। बच्चा अपनी भावनाओं को समझने, प्रतीक्षा करने, संवाद स्थापित करने और समस्याओं का सामना करने के बजाय स्क्रीन के माध्यम से स्वयं को शांत करना सीखने लगता है।
मोबाइल एडिक्शन का सबसे स्पष्ट संकेत तब दिखाई देता है, जब बच्चे से मोबाइल वापस लिया जाता है। कई बच्चे तत्काल रोने लगते हैं, चीखते-चिल्लाते हैं, जमीन पर लेट जाते हैं या वस्तुएँ फेंकने लगते हैं। कुछ बच्चों में अत्यधिक चिड़चिड़ापन, गुस्सा और आक्रामकता देखने को मिलती है। बड़े बच्चों और किशोरों में यह व्यवहार बहस, झगड़े, विरोध और कभी-कभी हिंसक प्रतिक्रिया के रूप में भी सामने आ सकता है। मनोविज्ञान की भाषा में यह स्थिति उन "विथड्रॉल लक्षणों" जैसी होती है, जो किसी व्यसन से दूर किए जाने पर दिखाई देते हैं। यह संकेत है कि मोबाइल अब केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि भावनात्मक नियंत्रण का माध्यम बन चुका है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से मोबाइल एडिक्शन एक व्यवहारिक व्यसन (Behavioral Addiction) के रूप में देखा जाता है। बार-बार नोटिफिकेशन देखना, सोशल मीडिया स्क्रॉल करना, गेम खेलना या वीडियो देखना मस्तिष्क के पुरस्कार तंत्र (Reward System) को सक्रिय करता है। इससे डोपामिन नामक रसायन का स्राव होता है, जो क्षणिक आनंद का अनुभव कराता है। धीरे-धीरे मस्तिष्क उसी आनंद की पुनरावृत्ति चाहता है और व्यक्ति बार-बार मोबाइल की ओर आकर्षित होने लगता है।
इसका परिणाम यह होता है कि वास्तविक जीवन की सामान्य गतिविधियाँ बच्चों और युवाओं को नीरस लगने लगती हैं। पुस्तक पढ़ना, परिवार के साथ समय बिताना, खेलना, प्रकृति के बीच रहना या मित्रों से प्रत्यक्ष बातचीत करना उन्हें कम आकर्षक प्रतीत होने लगता है। उनकी धैर्य क्षमता घटने लगती है और वे हर चीज तुरंत प्राप्त करने की अपेक्षा करने लगते हैं।
स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी (Blue Light) भी चिंता का विषय है। यह प्रकाश आँखों के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचकर शरीर की जैविक घड़ी को प्रभावित कर सकता है। विशेष रूप से रात के समय अत्यधिक स्क्रीन उपयोग नींद को नियंत्रित करने वाले हार्मोन मेलाटोनिन के स्राव में बाधा उत्पन्न कर सकता है। परिणामस्वरूप नींद की गुणवत्ता खराब होती है, थकान बढ़ती है, एकाग्रता प्रभावित होती है और मानसिक तनाव में वृद्धि हो सकती है। लंबे समय तक अत्यधिक स्क्रीन उपयोग आँखों पर दबाव बढ़ाने के साथ-साथ मस्तिष्कीय कार्यप्रणाली और न्यूरल नेटवर्क की कार्यक्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
मोबाइल आधुनिक जीवन की आवश्यकता है, लेकिन जब यह हमारी भावनाओं, व्यवहार और रिश्तों को नियंत्रित करने लगे, तब सावधान होने का समय आ जाता है। हमें यह समझना होगा कि तकनीक जीवन को बेहतर बनाने का साधन है, जीवन का विकल्प नहीं। यदि आज हमने संतुलन नहीं सीखा, तो आने वाली पीढ़ियाँ डिजिटल रूप से जुड़ी हुई अवश्य होंगी, परंतु भावनात्मक रूप से पहले से कहीं अधिक अकेली और असुरक्षित भी हो सकती हैं।
-डॉ. गार्गी पांडेय चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट एवं काउंसलर















