भोपाल, 15 जून।
मध्यप्रदेश में पर्यावरण की लड़ाई फाइलों में दम तोड़ रही है। एसआईए और पर्यावरण विभाग की कुर्सी की जंग में प्रदेश का भविष्य घुट रहा है। जिस महकमे के कंधों पर 8.30 करोड़ लोगों को स्वच्छ हवा, शुद्ध पानी और स्वस्थ वातावरण देने की जिम्मेदारी है, वही आज ऑक्सीजन के लिए सरकार के दरवाजे पर गुहार लगा रहा है। स्टेट एनवायरमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी (एसआईए) और पर्यावरण विभाग अब पर्यावरण बचाने के बजाय एक-दूसरे की फाइलें बचाने में उलझे हैं। एसआईए अध्यक्ष को सरकार को पत्र लिखकर कहना पड़ा कि विभाग के अधिकारी काम नहीं करने दे रहे। जब रखवाले ही अखाड़े में उतर जाएं, तो जंगल को कौन बचाएगा?
मध्यप्रदेश को टाइगर स्टेट का गौरव यूं ही नहीं मिला। यह वनकर्मियों की मेहनत, वैज्ञानिकों के शोध और आम लोगों की भागीदारी का परिणाम है। लेकिन यदि नीति बनाने वाले ही निवेश और पर्यावरण की लड़ाई में उलझे रहेंगे, तो यह पहचान बचाना कठिन होगा। सरकार को समझना होगा कि पर्यावरण विभाग कोई सामान्य प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के फेफड़ों की सुरक्षा से जुड़ा विभाग है।
विवाद की जड़ भोपाल के बैरसिया की 21 एकड़ सरकारी जमीन है। एसआईए का आरोप है कि पर्यावरण विभाग ने वहां पेड़ काटने की अनुमति नियमों की अनदेखी कर दी, जबकि विभाग सभी प्रक्रियाओं को वैध बता रहा है। 39 मामलों में अनुमति देने को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। यह लड़ाई पेड़ और परियोजना की नहीं, बल्कि अधिकार और अहंकार की बन गई है। परिणाम यह है कि न पर्यावरण सुरक्षित है और न निवेश का माहौल।
प्रदेश के कई शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक लगातार चिंताजनक स्तर पर पहुंच रहा है। नदियों का जलस्तर घट रहा है और वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास प्रभावित हो रहा है। ऐसे समय में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संस्थानों का आपसी टकराव पूरे तंत्र पर सवाल खड़े करता है। जनता जानना चाहती है कि जब विभाग अपना ही समन्वय नहीं बचा पा रहा, तो प्रदेश का पर्यावरण कैसे बचाएगा।
अब समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, स्पष्ट जवाबदेही का है। सरकार को तत्काल यह तय करना चाहिए कि अंतिम अनुमति का अधिकार किसके पास होगा और संस्थागत भ्रम समाप्त किया जाए। विवादित मामलों की स्वतंत्र जांच कराई जाए और दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई हो। साथ ही, पर्यावरण संरक्षण की सफलता का आकलन केवल फाइलों से नहीं, बल्कि कटे और लगाए गए पेड़ों, वायु गुणवत्ता और पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया के आधार पर किया जाना चाहिए। पर्यावरण की रक्षा अहंकार से नहीं, समन्वय और जवाबदेही से ही संभव है।














