संपादकीय
15 Jun, 2026

ईरान-इजरायल युद्ध की चिंगारी से भारत की थाली तक आग: ड्राई फ्रूट्स पर मंडराया महंगाई का संकट, 5 फीसदी मुनाफे के लिए जूझते कारोबारी

ईरान-इजरायल युद्ध के कारण वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होने से भारत में ड्राई फ्रूट्स की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है और त्योहारों से पहले कारोबारियों तथा उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ गई है।

ग्वालियर, 15 जून।

त्योहारों की रौनक, शादी-ब्याह की शान और सेहत का खजाना कहे जाने वाले ड्राई फ्रूट्स अब आम आदमी की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं। वजह है ईरान और इजरायल के बीच छिड़ा युद्ध। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने अमेरिका से लेकर अफगानिस्तान तक ड्राई फ्रूट्स की सप्लाई चेन को हिला दिया है। नतीजा, ग्वालियर से लेकर इटली तक 7,200 कंटेनर फंसे पड़े हैं। डॉलर का भाव 90 रुपये से बढ़कर 95 रुपये तक पहुंच गया है और कारोबारियों का मुनाफा 5 फीसदी पर सिमट गया है।

ईरान-इजरायल की लड़ाई हजारों किलोमीटर दूर है, परंतु उसकी तपिश ग्वालियर के बाजार तक पहुंच गई है। ड्राई फ्रूट्स सिर्फ शौक नहीं, सेहत हैं। बच्चों की ग्रोथ, बुजुर्गों की ताकत और गर्भवती महिलाओं का पोषण इनसे जुड़ा है। जब 5 फीसदी मुनाफे के लिए कारोबारी जूझ रहा हो और 37 फीसदी महंगाई से ग्राहक परेशान हो, तो समझिए कि सप्लाई चेन सिर्फ इकोनॉमिक्स नहीं, नेशनल सिक्योरिटी का भी मुद्दा है। भारत को खाद्य तेल में जो गलती हुई, वह ड्राई फ्रूट्स में नहीं दोहरानी चाहिए। युद्ध रुकने तक दाम कम नहीं होंगे, परंतु तब तक मेक इन इंडिया को ग्रो इन इंडिया तक ले जाना होगा। कश्मीर से कन्याकुमारी तक बादाम और अखरोट के बाग लगाने होंगे, वरना हर त्योहार पर हम यही खबर पढ़ेंगे कि यह अब आराम का मामला है और आम आदमी की थाली से मेवा गायब होता रहेगा।

भारत दुनिया में ड्राई फ्रूट्स का सबसे बड़ा आयातक है। बादाम का 90 फीसदी हिस्सा अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया से, पिस्ता ईरान और अमेरिका से तथा अखरोट अफगानिस्तान और चिली से आता है। इजरायल-ईरान तनाव ने होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर के मार्ग को खतरनाक बना दिया है। ग्वालियर, दिल्ली और मुंबई के आयातकों के करीब 7,200 कंटेनर समुद्र में फंसे हैं। इनमें बादाम, पिस्ता, अंजीर, किशमिश और अखरोट सहित 200 करोड़ रुपये से अधिक का माल है। शिपिंग कंपनियों ने 'वॉर रिस्क सरचार्ज' लगा दिया है। पहले जो कंटेनर 3-4 महीने में आता था, अब 5-6 महीने लग रहे हैं। किराया 40 फीसदी तक बढ़ गया है। इंश्योरेंस कंपनियां खाड़ी देशों से आने वाले माल पर कवर देने से कतरा रही हैं।

3-4 महीने पहले जब विदेशी ऑर्डर बुक किए गए थे, तब डॉलर 90 रुपये के आसपास था। भुगतान अब करना है और डॉलर 95 रुपये को छू रहा है। यानी हर डॉलर पर 5 रुपये का सीधा घाटा। ग्वालियर के एक बड़े आयातक का दर्द समझिए। उसने 1 लाख डॉलर का पिस्ता मंगाया। बुकिंग के समय कीमत 90 लाख रुपये थी, लेकिन आज भुगतान करने पर 95 लाख रुपये देने होंगे। माल अभी मिला नहीं और 5 लाख रुपये का नुकसान पहले ही हो गया। छोटे कारोबारी तो बर्बादी के कगार पर हैं। उनका कहना है कि सैंडस्टोन की तरह उनका धंधा भी चटक रहा है। पहले ड्राई फ्रूट्स पर 12 से 15 फीसदी मुनाफा मिलता था, अब खर्च बढ़ने और डॉलर महंगा होने से मुनाफा 5 फीसदी पर आ गया है। कई कारोबारी अब दुकान बंद करने की सोच रहे हैं।

ईरान और अमेरिका से सप्लाई प्रभावित होने का असर सीधे रिटेल बाजार पर दिख रहा है। पिछले दो महीनों में दाम तेजी से बढ़े हैं। बादाम (अमेरिकी) 800 रुपये से बढ़कर 1050 रुपये (31 फीसदी वृद्धि), पिस्ता (ईरानी) 1600 रुपये से बढ़कर 2200 रुपये (37 फीसदी वृद्धि), अखरोट गिरी 1200 रुपये से बढ़कर 1500 रुपये (25 फीसदी वृद्धि) और अंजीर 1100 रुपये से बढ़कर 1400 रुपये (27 फीसदी वृद्धि) हो गया है। त्योहारों का सीजन सिर पर है। रक्षाबंधन, जन्माष्टमी और फिर दिवाली आने वाली है। हलवाई, नमकीन वाले और गिफ्ट पैक बनाने वाले सभी परेशान हैं। 500 रुपये का डिब्बा अब 700 रुपये में पड़ रहा है। मध्यम वर्ग ने बादाम और अखरोट खरीदना कम कर दिया है। गरीब के लिए तो यह अब वास्तव में आराम का मामला बन गया है।

जब ईरान का रास्ता बंद हुआ तो कारोबारी अफगानिस्तान की ओर बढ़े। कंधार और काबुल से अखरोट और अंजीर आता है, परंतु वहां तालिबान शासन के कारण बैंकिंग चैनल बाधित हैं। हवाला के जरिए भुगतान करना पड़ता है, जो जोखिम भरा है। पाकिस्तान के रास्ते माल लाना भी अब महंगा और असुरक्षित हो गया है। ऑस्ट्रेलिया और चिली से बादाम और अखरोट मंगाने की कोशिश हो रही है, लेकिन वहां का माल 20 फीसदी महंगा है। कैलिफोर्निया में सूखे की वजह से बादाम का उत्पादन 15 फीसदी घटा है। यानी दुनिया भर में सप्लाई कम और मांग ज्यादा है। काजू में भारत आत्मनिर्भर है, परंतु बादाम और पिस्ता का कोई घरेलू विकल्प नहीं है। कश्मीर और अफगानिस्तान के अखरोट की गुणवत्ता अलग है और मात्रा भी सीमित है।

सरकार को ईरान और यूएई के साथ रुपया-रियाल ट्रेड मैकेनिज्म मजबूत करना चाहिए, ताकि डॉलर पर निर्भरता घटे और करेंसी का झटका कम लगे। शिपिंग और इंश्योरेंस पर सब्सिडी देकर युद्ध क्षेत्र से आने वाले खाद्य पदार्थों पर वॉर रिस्क इंश्योरेंस का 50 फीसदी भार सरकार वहन कर सकती है। साथ ही, नाफेड और मदर डेयरी जैसे संस्थानों के माध्यम से बफर स्टॉक बनाया जाए तथा प्याज-टमाटर की तरह ड्राई फ्रूट्स के लिए भी प्राइस स्टेबलाइजेशन फंड बनाया जाए।

कारोबारियों के लिए भी यह सबक है कि सिर्फ एक देश पर निर्भरता खतरनाक है। उन्हें अमेरिका और ईरान के साथ-साथ चिली, तुर्की और उज्बेकिस्तान जैसे देशों से भी व्यापारिक संबंध विकसित करने होंगे। फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट और करेंसी हेजिंग को अपनाना समय की जरूरत है। यदि डॉलर 90 रुपये पर बुक किया था तो 95 रुपये के जोखिम को पहले ही हेज करना चाहिए था। छोटे व्यापारियों को भी यह सीखना होगा।

मेवे की मिठास में घुला भू-राजनीति का यह जहर हजारों किलोमीटर दूर छिड़े युद्ध की देन है, लेकिन इसकी तपिश भारत के बाजारों तक महसूस की जा रही है। युद्ध रुकने तक कीमतों में राहत की उम्मीद कम है। ऐसे में मेक इन इंडिया को ग्रो इन इंडिया तक ले जाना होगा। कश्मीर से कन्याकुमारी तक बादाम और अखरोट के बाग लगाने होंगे, वरना हर त्योहार पर आम आदमी की थाली से मेवा और दूर होता जाएगा।

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